एक मनुष्य संपूर्ण - डॉ. दिविक रमेश
कवि परिचय:
डॉ.दिविक रमेश का जन्म वर्ष 1946 में दिल्ली के किराड़ी गाँव में हुआ।
उनका मूल नाम रमेश शर्मा है। दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएच.डी के साथ प्राध्यापन के पेशे से संबद्ध हुए और मोती लाल नेहरू कॉलेज,
दिल्ली के प्राचार्य पद तक पहुँचे। उन्होंने दक्षिण कोरिया में
अतिथि आचार्य के रूप में भी कार्य किया है। इससे पूर्व लगभग दो दशक दूरदर्शन से
जुड़े रहे, जहाँ विविध कार्यक्रमों के संचालन में योगदान
किया है। उन्होंने कविता, काव्य-नाटक, आलोचना एवं बाल-साहित्य जैसी
विभिन्न विधाओं में लेखन किया है।
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मनुष्य संपूर्ण कविता
का सार:
"एक मनुष्य
संपूर्ण - डॉ. दिविक रमेश" कविता महान मानवतावादी महात्मा बसवेश्वर के
विचारों पर आधारित है और उनकी विचारधारा और समाज में होने वाले पाखंड की ओर इशारा
करती है। इस कविता के माध्यम से कवि ने महात्मा बसवेश्वर के सिद्धांतों की महत्ता
को स्पष्ट किया है और समाज में होने वाले विविध प्रकार के पाखंडों पर प्रकाश डाला
है। बसवेश्वर सामाजिक और धार्मिक पाखंडवाद पर आघात करने वाले सबसे बड़े समाज सुधारकों में से एक हैं। अंधविश्वास और अनैतिक कार्यों को ध्वस्त करने में उनकी बड़ी भूमिका रही हैं। बसवेश्वर के इस कार्य को कवि अपनी कविता के द्वारा याद करते हैं एवं एक संपूर्ण
मनुष्य की कल्पना करते है।
प्रस्तुत कविता में कवि कहते हैं कि जो पाखंडवादी सोच कई वर्षों से चली आ रही है वह खंडित क्यों नहीं हो पा रही हैं। समाज में एक व्यक्ति
दूसरे व्यक्ति का ध्वंस करने के लिए इतना तत्पर क्यों दिखाई देता है। इस प्रकार की
आग सभी जगह लगी हुई है। जिसमें एक व्यकित दूसरे का नाश चाहता है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य
को निम्न दिखाना चाहता है। यह सब बंद एवं खत्म होने की आवश्यकता है लेकिन ये ना ही
बंद हो पा रहा है ना यह जल पा रहा है। क्योंकि लोग इसे खारिज नहीं कर रहे,
जिसे खंडित करने की आवश्यकता है। कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ
"किस ओर नहीं लगी है आग, फिर भी नहीं जल पा रहा वही
वही, जिसे जल जाना चाहिए" से आरंभ होती है। समाज में
पाखंडता और असत्य को प्रकट करने में मदद करने वाली चीजों को खारिज़ होना चाहिए। वे
यह भी दिखाते हैं कि अनेक लोग जो सत्य की ओर नहीं बढ़ते, उन्हें
वास्तविकता की ओर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता होती है।
कवि कहते हैं की चालाकियों
का बाजार आज भी बंद नहीं हुआ है। स्त्री के शोषण फसलें हर ओर लहलहा रही हैं। शोषण
की पुरानी व्यवस्थाएं जैसे जातिवाद, लैंगिक भेदभाव को और ज्यादा मजबूत किया जा रहा है। इसे मजबूत करने वाले
मुट्ठी भर ताकतवर लोग है. उनका यह खेल मनुष्य के ज्ञान और आत्मा तक पहुँचकर उसे वास्तविकता से दूर कर चूका हैं।
जिससे उसकी नींव और इस व्यवस्था को मजबूती देने वाले उसके स्तंभ और अधिक शक्तिशाली
बनते जा रहे हैं। अत: आज इन चालाकियों
के बाजार ने विकराल रूप धारण कर लिया है।
कवि बसवेश्वर को याद करते हुए कहते हैं की क्या आपको अब भी
ऐसा नहीं लगता की आज के समय में आपकी सर्वाधिक आवश्यकता है। आपके वचनों की आवश्यकता
है। हे पक्षधर, क्रांतिदूत तुमने ही तो स्त्रियों को द्विज बनाया था
अर्थार्थ उन्हें शिक्षा का अधिकार दिया था. आज फिर से परिस्थितियां मानवता के
खिलाफ है. ऐसे समय में हे पक्षधर क्रांतिदूत तूम कहाँ हो, तुम वापस आ कर आधुनिक समय के पढ़े लिखे निरक्षरों को साक्षर बनाओ क्योंकि उनकी
आँखों पर अज्ञान का पर्दा पड़ा हुआ है. आप इस धरती पर वापस आइए ताकि जिनमें आत्मविश्वास नहीं है, उनमें आत्मविश्वास भर दो,
जिससे शक्तिहिनों में शक्ति आ जाएगी। और यह पाखंड,
भेदभाव एवं शोषण की हवा चल रही है वह उसे रोक पाऐंगे।
अबलाओं को सबला कर दो। जिससे वे अंधविश्वास, असत्य, ढ़ोंग और जातिभेद के भस्मासूर को बड़ी अग्नि में भस्म कर सके। अत: यह पृथ्वी एक ऐसे मनुष्य का जन्म चाहती है जो आग के गर्भ से पैदा हो और अपने श्रम और कार्य से संपन्न, आदर पाने वाला एक संपूर्ण मनुष्य हो।
कविता के तीसरे भाग में,
कवि ने महिलाओं के अधिकारों पर बल दिया है। उन्होंने बताया कि
समाज में उन्हें भी समानता का अधिकार होना चाहिए और उन्हें भी समाज के विकास में
योगदान देने का मौका मिलना चाहिए।
कविता
के आखिरी भाग में, कवि ने समाज में
असत्य, अंधविश्वास और जातिभेद के खिलाफ आवाज उठाने एवं
इनका नाश करने के एक ऐसे संपूर्ण मनुष्य की कल्पना की है जो इस धरती पर फिर से आए
और अपने ज्ञान और परिश्रम से एक सुंदर दुनिया के निर्माण में योगदान दें। उन्होंने
समाज को प्रेरित किया है कि वह समृद्धि की दिशा में आगे बढ़े।
इस प्रकार, "एक मनुष्य सर्वज्ञ - डॉ. दिविक रमेश" कविता महात्मा बसवेश्वर के
आदर्शों के प्रति कवि की आदरणीय भावना के साथ, समाज में
प्रचलित असत्य और पाखंड के खिलाफ एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। यह कविता हमें यह
बताती है कि हमें सत्य की प्रतिबद्धता के साथ समाज में बदलाव लाने का निर्णय लेना
चाहिए, और महात्मा बसवेश्वर की विचारधारा को आगे बढ़ाने
का प्रयास करना चाहिए।