Tuesday, April 8, 2025

गुळ्ळकायजी नाटक - चंद्रशेखर कम्बार Gullakayaji - Chandrashekhar Kambar

गुळ्ळकायजी नाटक - चंद्रशेखर कम्बार Gullakayaji - Chandrashekhar Kambar 

गुळ्ळकायजी नाटक का सार लिखिए।

गुळ्ळकायजी नाटक के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

गुळ्ळकायजी नाटक में चित्रित पात्रों वर्णन कीजिए। 

'गुळ्ळकायजी' चंद्रशेखर कम्बार द्वारा लिखा गया एक नाटक है जो भद्रबाहु बाहुबली महाराज के ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है। जब चावुंड़राय अपनी माँ काळलदेवी के साथ भद्रबाहु की गुफा की ओर जाता है तो भागवत कथा सुना रहे थे। उन्होंने वृषभदेव के पुत्र भरत और बाहुबली की कथा सुनाई। जब भरत विश्वविजय कर बाहुबली के राज्य को जितने की मंशा से पौदनपुर आते हैं तो भरत और बाहुबली में युद्ध होता है।  बाहुबली महाराज पौदनपुर के महान राजा थे। उन्होंने अपने भाई भारत से दृष्टियुद्ध, जलयुद्ध और मलयुद्ध  युद्ध किया और युद्ध जीत लिया। जैसा की तय हुआ था भरत को अपना राज्य त्यागना था हालांकि, जब उनके भाई के आंसू बाहुबली के पैरों पर गिरे, तो बाहुबली ने अपने भाई के लिए अपना राज्य छोड़ने का निर्णय लिया। और एक वर्ष तक जंगल में तपस्या करते रहे। बाहुबली महाराज की याद में, उनके भाई ने बाहुबली की 60 फीट ऊंची मूर्ति बनाई, जो एक ही पत्थर से तराशी गई थी।  चावुंड़राय अपनी माँ काळलदेवी के साथ के साथ उस मूर्ति को देखने गए, तो वह मूर्ति वहाँ नहीं मिली। एक रात, एक देवी ने चावुंड़राय और उनकी काळलदेवी के सपने में आकर उन्हें श्रवणबेलगोला में ही 60 फीट ऊंची मूर्ति बनाने का आदेश दिया। चावुंड़राय को यह समझ नहीं आया कि इसे कैसे किया जाए। देवी ने उन्हें एक छोटे पहाड़ पर जाने और एक बड़े पहाड़ की ओर तीर चलाने के लिए कहा, और फिर बाहुबली की मूर्ति प्रकट हो जाएगी।

अगली सुबह, चावुंड़राय, सफेद धोती और कुर्ता पहने हुए, अपनी काळलदेवी और परिवार के साथ एक छोटे पहाड़ के केंद्र में गए और तीर चलाया। तुरंत, एक बड़ा पत्थर उस पहाड़ पर दिखाई दिया। फिर चावुंड़राय ने एक शिल्पकार की तलाश शुरू की जो उस मूर्ति को तराश सके।

एक दिन, चावुंड़राय के मंत्री ने शिल्पकार के घर जाकर पूछा कि क्या बूढ़ीया शिल्पकार ने इस कार्य को स्वीकार किया है। शिल्पकार की अनुमति के बिना, बूढ़ीया या ने मंत्री से कहा कि शिल्पकार बाहुबली की 60 फीट ऊंची मूर्ति बनाने के लिए तैयार था। हालांकि, शिल्पकार को यह नहीं पता था कि उसे इस काम को कैसे करना चाहिए। उसे मूर्ति के माप या एक ही पत्थर से इतनी बड़ी मूर्ति को तराशने की तकनीक का ज्ञान नहीं था।

शिल्पी ने अपनी बात बताई की किस प्रकार से उसके पिता की मुत्यु उसके कारण हो गई थी। जब शिल्पी अपने पिता को खोजें उत्तर देश गया तो  उसके पिता ने उसे एक देवी की मूर्ति दिखाई इसपर शिल्पी ने कहा इस मूर्ति की आंखे तो है लेकिन इसकी दृष्टि नहीं है। इस बात से नाराज होकर पिता ने आत्महत्या कर की और यह संदेश जब शिल्पी ने माँ को दिया तो वह भी दुख से मर गई। इसलिए शिल्पी कहता की अब तो पिता भी नहीं है की वे मुझे यह मूर्ति बनाने के लिए अपना अनुभव बताते मुझे मार्गदर्शन करते। 

जब शिल्पी मान नहीं रहा था तो बूढ़ीया ने शिल्पकार को तपस्या करने और बाहुबली महाराज से मार्गदर्शन प्राप्त करने की सलाह दी। उनकी सलाह के अनुसार, शिल्पकार ने तीन दिन तपस्या (ध्यान) किया। पहले दिन वह बहुत डर गया था। दूसरे दिन उसे भूख और प्यास साता रही थी तीसरे दिन वह सोच रहा था की अब बाहुबली महाराज प्रसन्न नहीं हुए तो मैं यहीं बड़े पत्थर से कूदकर जान दे दूँगा। और शिल्पी बाहुबली महाराज से प्रार्थना करने लगा। उसकी तपस्या के दौरान, बाहुबली महाराज ने उसे दर्शन दिए और पूछा की तुम्हें क्या चाहिए। प्रसिद्धि देखने की आँख चाहिए या मुझे देखने की आँख चाहिए। जब शिल्पी ने बताया की  मुझे देखने की आँख चाहिए और 60 फीट की मूर्ति को तराशने का तरीका बताया। दर्शन देने के बाद, बाहुबली महाराज उसी 60 फीट के पत्थर में विलीन हो गए। शिल्पकार ने 12 वर्षों तक कठिन परिश्रम किया और बाहुबली की शानदार मूर्ति बनाई, जो अब उदयगिरी पर्वत पर गर्व से खड़ी है। चंदरगिरी पर्वत पर बनी मूर्ति इतनी बड़ी और ऊंची है कि दूर से लोग और महिलाएं छोटे चींटी की तरह दिखाई देते हैं।

एक दिन, चावुंड़राय ने महामस्तकाभिषेक का आयोजन करने का निर्णय लिया। महामस्तकाभिषेक का आयोजन किया गया और उसमें कई गणमान्य व्यक्तियों को आमंत्रित किया गया। जिसमें दानचिन्तामनी अत्तीमब्बे जो सेनापती नागदेव की पत्नी थी। और अहिंसा की प्रचारक थी। अत्तीमब्बे ने हजारों मूर्तियां और धार्मिक किताबों को लोगों में बांटने का काम लिया था। और वे कई लोगों को मार्गदर्शन कर रही थी। इसी के साथ कवि रन्न भी पधारे थे। कवि रन्न जब चावुंड़राय से मिलते हैं तो दोनों में विचारविनिमय होता है। कवि रन्न 'अजितनाथ तीर्थंकर चरित' लिखना चाह रहे थे जो कवि पंप के 'आदिनाथ पुराण' से प्रेरित है। और यह कार्य बाहुबली स्वामी के मूर्ति के निर्माण से पहले लिखना चाह रहे थे। लेकिन रन्न का कहना है की शिल्पी ने मूर्ति बनाने का कार्य इतने तेजी से किया की रन्न का 'अजितनाथ तीर्थंकर चरित' ग्रंथ पूरा भी नहीं हो पाया है।  इस बीच  दानचिन्तामनी अत्तीमब्बे कवि रन्न की मुलाकात चंद्रगुप्त बसदी के पास होती है वहीं पर  चावुंड़राय यह योजना बताते हैं की वह शिल्पी का सम्मान दानचिन्तामनी अत्तीमब्बे के हाथों से करना चाहेगा। इसे अत्तीमब्बे बी बड़े दिल से स्वीकार करती हैं। और शिल्पी और बूढ़ी माँ को यह सन्देशा भेजती है की  अत्तीमब्बे आपसे और बूढ़ी माँ से  मिलना चाहती है। शिल्पी यह संदेश सुनकर शिल्पी बूढ़ी माँ के साथ अत्तीमब्बे को मिलने पहुँच जाता है।     

अत्तीमब्बे शिल्पी और बूढ़ी माँ से मिलकर बहुत खुश हो जाती है। और बतलाती है की किस प्रकार से उनके बटे ने एक महान कार्य किया है। जिसके लिए बूढ़ी माँ ने भी लगातार 12 वर्ष तक उसे बड़ा पहाड़ चढ़कर खाना किया था। इसलिए अत्तीमब्बे शिल्पी और बूढ़ी माँ का धन्यवाद करती है और शिल्पी को सम्मानित करने की बात बतलाती है।  शिल्पकार को उसके कार्य के लिए सम्मानित किया जाता है। हालांकि, शिल्पकार ने चावुंड़राय से सोने के सिक्कों का कोई भुगतान या सोने की मुद्राएं स्वीकार करने से इनकार कर दिया।  शिल्पी यह स्पष्ट करना चाहता था की वह ऐसा क्यों कर रहा है, और वह यह भी कहता है की अन्य शिल्पियों को भी सम्मानित किया जाना चाहिए। चावुंड़राय शिल्पी का नाम मूर्ति के नीचे लिखना चाहते हैं लेकिन शिल्पी नाम भी नहीं लिखवाना चाहता है। उसके अनुवास इसीसे बाहुबली स्वामी नाराज हो जाएंगे। इससे चावुंड़राय समझ ने लगा था की शिल्पी बड़ा अहंकारी हो गया है। लेकिन शिल्पी ने अपनी बूढ़ी माँ से वचन लिया था की अगर वह बाहुबली स्वामी की मूर्ती पर उसी प्रकार की मुस्कान उकेरने में सफल होगा जो उसने तीन दिन की तपस्या के समय देखी थी तो वह किसी से कोई पारिश्रमिक नहीं लेगा। चावुंड़राय शिल्पकार के इनकार से बहुत गुस्से में आ गए और उन्होंने उसे और उसकी बूढ़ी माँ को वहां से जाने का आदेश दिया। चावुंड़राय ने मंत्री को आदेश दिया की महामस्तकाभिषेक समारोह में किसी भी बात की कमी नहीं होनी चाहिए नहीं तो वे क्रोध का कारण बनेंगे। 

महामस्तकाभिषेक समारोह में गुळ्ळकायजी भी आयी हैं। महामस्तकाभिषेक समारोह के दौरान, मूर्ति को दूध, गन्ने का रस, पानी, नारियल पानी, कषाय, हल्दी का लेप और अन्य अर्पणों से स्नान कराया गयातीन दिन बीत गए, लेकिन मूर्ति पूरी तरह से मूर्ति पूरी तरह नहीं भीग पा रही थी। चावुंड़राय और भक्ति भाव से आए बाहुबली स्वामी के भक्तगण इस दोष के कारण डरे हुए हैं। वे सोच रहे हैं की शायद भविष्य में कोई बुरी घटना घटने वाली हैं और इसलिए मूर्ति पूरी तरह नहीं भीग रही है। चावुंड़राय वहाँ आए सभी जनों से अनुरोध कर रहे हैं की अगर किसी को कोई समाधान पता हो तो  कृपया बताए कोई शास्त्र, तोते का शास्त्र हो तो बताएं। इसबीच चावुंड़राय देखते हैं की एक बूढ़ीया कटोरे में दूध लेकर ऊपर जा रही हैं और चावुंड़राय उस बूढ़ीया को ऊपर जाने से रोक दिया जाता है। बूढ़ी माँ नीचे आ जाती है। इसपर  अत्तीमब्बे और रन्न कवि  चावुंड़राय को सलाह देते हैं कि बाकी शिल्पियों का भी वे सम्मान करें। इसपर भी चावुंड़राय मान जाते हैं। 

चावुंड़राय जब बूढ़े लोगों से बातचीत कर रहा था उसी समय एक बुजुर्ग ने बताया की एक व्यक्ति यह कहता हुआ क्रोध से चला गया कि वह अहंकारी है, अहंकार भरा है। चावुंड़राय इसकी पुछताज करता है की वह कौन था कहाँ से आया था। और किसी ने उसे देखा या नहीं। कुछ लोग यह भी कहा जा ता है की वह व्यक्ति श्रवण बेलगोल का नहीं लगता था। चावुंड़राय को अब भी लगता है शिल्पी की वजह से ही मूर्ति कामहामस्तकाभिषेक समारोह सम्पन्न नहीं हो पा रहा है। इसपर अत्तीमब्बे कहती है कि कुछ भी हो आपको बूढ़ी माँ को ऊपर जाकर उसकी मन्नत पूरी करने की अनुमति देनी चाहिए दंडनायक जी। क्योंकि 12 साल तक उस बुढी माँ ने शिल्पी को खाना खिलाया 12 साल तक वह उस पहाड़ पर चढ़कर शिल्पी को मूर्ति बनाने के लिए मदद की। कुछ भी हो सबसे चावुंड़राय जी हमें महामस्तकाभिषेक समारोह में आए व्यत्यय को, बुरे शकुन को दूर करने का प्रयास करना चाहिए चावुंड़राय इस बात को मानता है। लेकिन यह देखने के लिए की एक दूध बेचने वाली बूढ़ी गरीब महिला बाहुबली महाराज के महामस्तकाभिषेक के लिए जा रही है और वह आँगन में जाकर खड़ा हो जाता है। 

बूढ़ी माँ  गुळ्ळकायजी जब छोटे कटोरे में दूध की धार बाहुबली के मस्तिष्क पर बहाती है तो वह छोटी धार बड़ी धार में बदल जाती है  और उस बड़ी धारा से बाहुबली स्वामी का पूरा शरीर भीग जाता है। जिसे सभी बाहुबली स्वामी के भक्त आनंदित हो जाते हैं और बाहुबली महाराज की जय जयकार करने लगते हैं। बाहुबली स्वामी की जय जयकार सुनकर चावुंड़राय को भी याद आता है की गुळ्ळकायजी की आवाज और सपनों में आयी देवी माँ की आवाज तो एक ही हैं। वह दौड़कर ऊपर आ जाता है। गुळ्ळकायजी जो ऊपर स्वामी के सर पर दूध बहाने के लिए ऊपर गई थी वह अब कमजोर और अशक्त हो गई थी। शिल्पी उसे उठाकर लाता है और मूर्ति के चरणों के पास लाकर बिठाता है। चावुंड़राय माफी मांगने लगता है की हे देवी माँ मुझे माफ कीजिए मैं आपको पहचान न सका। इस प्रकार गुळ्ळकायजी ने  चावुंड़राय का अहंकार दूर किया था। इसप्रज सभी लोग  गुळ्ळकायजी की भी जय जयकार करने लगते हैं। उसी समय गुळ्ळकायजी जहां बैठी थी वहीं अपने प्राण त्याग देती हैं। शिल्पी वहाँ से चला जाता है। सभी लोग बाहुबली की जय जयकार करने लगते हैं। नाटक समाप्त होता है। 

गुळ्ळकायजी नाटक - चंद्रशेखर कम्बार 

Gullakayaji - Chandrashekhar Kambar

Wednesday, April 2, 2025

विदिशा की ओर - राहुल सांकृत्यायन

 विदिशा की ओर - राहुल सांकृत्यायन 

1.'विदिशा की ओर' यात्रा का सार लिखिए। 

2.राहुल सांकृत्यायन की 'विदिशा की ओर' यात्रा का विस्तृत सारांश लिखिए। 

3.प्राचीन 'विदिशा' नगरी के ऐतिहासिक, धार्मिक एवं आर्थिक महत्व को स्पष्ट  कीजिए।

4.विदिशा और दशार्ण के द्वारा राहुल सांकृत्यायन ने भाषा और भारतीय राजनीति पर अपने कैसे विचार किए है स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर -   राहुल सांकृत्यायन परिचय(1893-1963)

राहुल सांकृत्यायन उच्चकोटि के विद्वान् और अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। आप का वास्तविक नाम केदारनाथ पांडे था। इन्होंने संस्कृत ग्रन्थों को हिन्दी टीकाएँ कीं, कोशग्रन्थ तैयार किए तथा तिब्बती भाषा और 'तालपोथी' आदि पर दक्षतापूर्वक लिखा है। वस्तुतः यह सब उनकी बहुमुखी प्रतिभा का परिचायक है। राहुल जी को सबसे अधिक सफलता यात्रा- साहित्य लिखने में मिली है। आपकी प्रमुख रचनाएँ हैं  'सतमी के बच्चे', 'वोल्गा से गंगा', 'कनैल की कथा'(कहानियाँ), 'विस्मृत यात्री', 'मेरी जीवन-यात्रा', 'असहयोग के मेरे साथी'(जीवनी साहित्य), 'मेरी लद्दाख यात्रा', 'मेरी तिब्बत यात्रा', 'यात्रा के पन्ने', 'रूस में पच्चीस मास', 'घुमक्कड़शास्त्र' (यात्रा साहित्य)आदि।  विदिशा की ओर यह यात्रा वर्णन पुरानी विदिशा नगरी के खमबाबा स्तम्भ को दी गई भेंट वार्ता है

       राहुल सांकृत्यायन अपनी यात्रा के दौरान दशार्ण (वर्तमान भोपाल) पहुँचे, जहाँ उन्हें अगली गाड़ी के लिए तीन घंटे प्रतीक्षा करनी पड़ी। इसके बाद वे साँची और भिलसा (विदिशा) की ओर रवाना हुए। भिलसा में उन्हें वहाँ के लोग अधिक चुस्त और सक्रिय लगे। स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट बाबूराव सूर्यवंशी स्टेशन पर अतिथियों को लेने आए थे, परंतु उनके स्थान पर क्षीरोद बाबू और जयचंद्र विद्यालंकार उपस्थित थे। उन्होंने भिलसा के अतिथिभवन में ठहरने की अच्छी व्यवस्था का अनुभव किया। फिर वे 'खमबाबा' नामक स्थान पर पहुँचे, जहाँ प्रसिद्ध ग्रीक वैष्णव हेलियोदोर द्वारा स्थापित गरुड़ स्तंभ स्थित था। यह स्तंभ इस बात का प्रमाण था कि एक विदेशी ग्रीक राजा का दूत भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर वैष्णव बना था।

इसके बाद वे बेसनगर (प्राचीन विदिशा) गए, जो बेतवा और वेस नदियों के बीच स्थित था। यह प्राचीन काल में एक समृद्ध नगरी थी और ऐतिहासिक खुदाई से यहाँ की प्राचीन संस्कृति की झलक मिलती है। हालांकि, ऐसे ध्वंसावशेष पूरे देश में बिखरे हुए हैं और उनकी खुदाई व संरक्षण देश की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। उन्होंने गुप्तकाल में भी इस नगर की समृद्धि के संकेत देखे और ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक में वर्णित विदिशा की छवि उनकी स्मृतियों में उभर आई। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इन ध्वंसावशेषों में इस प्राचीन नगरी का पूरा इतिहास छिपा हुआ है।

विदिशा प्राचीन काल में केवल एक राजधानी के रूप में प्रसिद्ध नहीं थी, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र भी थी। यह नगर पश्चिमी समुद्र और दक्षिणापथ की ओर जाने वाले दो प्रमुख वणिकपथों के संगम पर स्थित था। इन व्यापार मार्गों के माध्यम से मथुरा, ग्वालियर, विदिशा, उज्जैन और माहिष्पति होते हुए व्यापारी भड़ौच (भरुकच्छ) और सोपारा (सुप्पारक) जैसे बंदरगाहों तक पहुँचते थे। इन बंदरगाहों से भारत का व्यापार अफ्रीका, मेसोपोटामिया, मिस्र और ग्रीस जैसे देशों से होता था। विशेष रूप से, रोमन सोने के सिक्कों का भारत में आगमन इसी मार्ग से होता था, जो इस व्यापारिक मार्ग के महत्त्व को दर्शाता है।

विदिशा न केवल व्यापारिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण थी। इस नगर का संबंध प्राचीन भारत के 'कौशांबी', श्रावस्ती, साकेत, पाटलिपुत्र और राजगृह—से था। यहाँ के ध्वंसावशेष आज भी इसके गौरवशाली अतीत की झलक प्रस्तुत करते हैं। विदिशा से कौशांबी जाने वाला मार्ग अत्यधिक प्रचलित था और इस पर वनकौशांबी तथा वनश्रावस्ती जैसे नगर थे। बौद्ध ग्रंथ ‘त्रिपिटक’ में इसे तुम्बव नगर या पवन नगर के नाम से जाना जाता था। यह वणिकपथ विंध्य पर्वत श्रृंखला से होकर गुजरता था और आधुनिक काल में इसे खोजने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में चंदेरी, देवगढ़, पपोरा, और खजुराहो जैसे प्राचीन नगर इसी मार्ग की जानकारी देने में सहायक हो सकते हैं।

लेखक का मत है कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए भाषा के आधार पर प्रांतों का पुनर्गठन आवश्यक है। यदि लोग अपनी भाषाई इकाइयों के आधार पर इतिहास के अध्ययन को आगे बढ़ाएँ, तो वे अपने अतीत की खोज में अधिक रुचि लेंगे। आर्थिक समृद्धि के लिए भी भाषायी आधार पर प्रांतों का पुनर्गठन आवश्यक है, ताकि कृषि और औद्योगिक योजनाओं को प्रभावी रूप से लागू किया जा सके। लेखक अंग्रेजों द्वारा किए गए प्रांतीय विभाजन की आलोचना करते हैं और इसे अव्यवस्थित मानते हैं। वे प्रश्न उठाते हैं कि यदि हिंदी को आधार मानकर प्रांतों का निर्माण किया जा रहा है, तो फिर राजस्थान, मध्य भारत, मध्य प्रदेश, विन्ध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, भोपाल और हिमाचल प्रदेश को अलग-अलग रखने की क्या आवश्यकता है? उनका तर्क है कि प्राचीन दशार्ण या आधुनिक बुंदेलखंड क्षेत्र का एक स्वतंत्र प्रांत के रूप में गठन आवश्यक है। बुंदेलखंड को एक स्वतंत्र प्रांत बनाने का तर्क देते हुए लेखक कहते हैं कि यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। यहाँ की पहाड़ी नदियों में पनबिजली परियोजनाओं और सिंचाई नहरों के विकास की व्यापक संभावनाएँ हैं। यह क्षेत्र खनिज संपदा के लिए भी प्रसिद्ध है—कोयला, हीरा (पन्ना) और अन्य बहुमूल्य खनिज यहाँ प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन, राजनीतिक स्वार्थों के कारण बुंदेलखंड प्रांत के निर्माण की माँग ठंडी पड़ गई है।

अंत में, लेखक खमबाबा और विदिशा के ध्वंसावशेषों को देखने के बाद आधुनिक भिलसा कस्बे की ओर लौटते हैं। वे पाते हैं कि प्राचीन विदिशा का क्षेत्र खमबाबा, उदयगिरि और साँची तक फैला हुआ था। भिलसा की जामा मस्जिद 12वीं शताब्दी के एक विशाल मंदिर के स्थान पर बनाई गई थी। इसके भीतर एक लेख अंकित है और दो कब्रों पर सुंदर नक्काशी है, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती है।