विदिशा की ओर - राहुल सांकृत्यायन
1.'विदिशा की ओर' यात्रा का सार लिखिए।
2.राहुल सांकृत्यायन की 'विदिशा की ओर' यात्रा का विस्तृत सारांश लिखिए।
3.प्राचीन 'विदिशा' नगरी के ऐतिहासिक, धार्मिक एवं आर्थिक महत्व को स्पष्ट कीजिए।
4.विदिशा और दशार्ण के द्वारा राहुल सांकृत्यायन ने भाषा और भारतीय राजनीति पर अपने कैसे विचार किए है स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - राहुल सांकृत्यायन परिचय(1893-1963) :
राहुल
सांकृत्यायन उच्चकोटि के विद्वान् और अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे।
आप का वास्तविक नाम केदारनाथ पांडे था। इन्होंने संस्कृत ग्रन्थों को हिन्दी टीकाएँ
कीं, कोशग्रन्थ तैयार किए तथा तिब्बती भाषा और 'तालपोथी' आदि पर दक्षतापूर्वक लिखा है। वस्तुतः यह सब
उनकी बहुमुखी प्रतिभा का परिचायक है। राहुल जी को सबसे अधिक सफलता यात्रा- साहित्य लिखने में मिली है। आपकी प्रमुख
रचनाएँ हैं 'सतमी के बच्चे', 'वोल्गा
से गंगा', 'कनैल की
कथा'(कहानियाँ), 'विस्मृत यात्री', 'मेरी जीवन-यात्रा', 'असहयोग
के मेरे साथी'(जीवनी साहित्य), 'मेरी लद्दाख यात्रा', 'मेरी
तिब्बत यात्रा', 'यात्रा के पन्ने', 'रूस
में पच्चीस मास', 'घुमक्कड़शास्त्र' (यात्रा साहित्य)आदि।
राहुल सांकृत्यायन अपनी यात्रा के दौरान दशार्ण (वर्तमान भोपाल) पहुँचे, जहाँ उन्हें अगली गाड़ी के लिए तीन घंटे प्रतीक्षा करनी पड़ी। इसके बाद वे साँची और भिलसा (विदिशा) की ओर रवाना हुए। भिलसा में उन्हें वहाँ के लोग अधिक चुस्त और सक्रिय लगे। स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट बाबूराव सूर्यवंशी स्टेशन पर अतिथियों को लेने आए थे, परंतु उनके स्थान पर क्षीरोद बाबू और जयचंद्र विद्यालंकार उपस्थित थे। उन्होंने भिलसा के अतिथिभवन में ठहरने की अच्छी व्यवस्था का अनुभव किया। फिर वे 'खमबाबा' नामक स्थान पर पहुँचे, जहाँ प्रसिद्ध ग्रीक वैष्णव हेलियोदोर द्वारा स्थापित गरुड़ स्तंभ स्थित था। यह स्तंभ इस बात का प्रमाण था कि एक विदेशी ग्रीक राजा का दूत भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर वैष्णव बना था।
इसके बाद वे बेसनगर (प्राचीन विदिशा) गए, जो बेतवा और वेस नदियों के बीच स्थित था। यह प्राचीन काल में एक समृद्ध नगरी थी और ऐतिहासिक खुदाई से यहाँ की प्राचीन संस्कृति की झलक मिलती है। हालांकि, ऐसे ध्वंसावशेष पूरे देश में बिखरे हुए हैं और उनकी खुदाई व संरक्षण देश की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। उन्होंने गुप्तकाल में भी इस नगर की समृद्धि के संकेत देखे और ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक में वर्णित विदिशा की छवि उनकी स्मृतियों में उभर आई। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इन ध्वंसावशेषों में इस प्राचीन नगरी का पूरा इतिहास छिपा हुआ है।
विदिशा प्राचीन काल में केवल एक राजधानी के रूप में प्रसिद्ध नहीं थी, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र भी थी। यह नगर पश्चिमी समुद्र और दक्षिणापथ की ओर जाने वाले दो प्रमुख वणिकपथों के संगम पर स्थित था। इन व्यापार मार्गों के माध्यम से मथुरा, ग्वालियर, विदिशा, उज्जैन और माहिष्पति होते हुए व्यापारी भड़ौच (भरुकच्छ) और सोपारा (सुप्पारक) जैसे बंदरगाहों तक पहुँचते थे। इन बंदरगाहों से भारत का व्यापार अफ्रीका, मेसोपोटामिया, मिस्र और ग्रीस जैसे देशों से होता था। विशेष रूप से, रोमन सोने के सिक्कों का भारत में आगमन इसी मार्ग से होता था, जो इस व्यापारिक मार्ग के महत्त्व को दर्शाता है।
विदिशा न केवल व्यापारिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण थी। इस नगर का संबंध प्राचीन भारत के 'कौशांबी', श्रावस्ती, साकेत, पाटलिपुत्र और राजगृह—से था। यहाँ के ध्वंसावशेष आज भी इसके गौरवशाली अतीत की झलक प्रस्तुत करते हैं। विदिशा से कौशांबी जाने वाला मार्ग अत्यधिक प्रचलित था और इस पर वनकौशांबी तथा वनश्रावस्ती जैसे नगर थे। बौद्ध ग्रंथ ‘त्रिपिटक’ में इसे तुम्बव नगर या पवन नगर के नाम से जाना जाता था। यह वणिकपथ विंध्य पर्वत श्रृंखला से होकर गुजरता था और आधुनिक काल में इसे खोजने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में चंदेरी, देवगढ़, पपोरा, और खजुराहो जैसे प्राचीन नगर इसी मार्ग की जानकारी देने में सहायक हो सकते हैं।
लेखक का मत है कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए भाषा के आधार पर प्रांतों का पुनर्गठन आवश्यक है। यदि लोग अपनी भाषाई इकाइयों के आधार पर इतिहास के अध्ययन को आगे बढ़ाएँ, तो वे अपने अतीत की खोज में अधिक रुचि लेंगे। आर्थिक समृद्धि के लिए भी भाषायी आधार पर प्रांतों का पुनर्गठन आवश्यक है, ताकि कृषि और औद्योगिक योजनाओं को प्रभावी रूप से लागू किया जा सके। लेखक अंग्रेजों द्वारा किए गए प्रांतीय विभाजन की आलोचना करते हैं और इसे अव्यवस्थित मानते हैं। वे प्रश्न उठाते हैं कि यदि हिंदी को आधार मानकर प्रांतों का निर्माण किया जा रहा है, तो फिर राजस्थान, मध्य भारत, मध्य प्रदेश, विन्ध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, भोपाल और हिमाचल प्रदेश को अलग-अलग रखने की क्या आवश्यकता है? उनका तर्क है कि प्राचीन दशार्ण या आधुनिक बुंदेलखंड क्षेत्र का एक स्वतंत्र प्रांत के रूप में गठन आवश्यक है। बुंदेलखंड को एक स्वतंत्र प्रांत बनाने का तर्क देते हुए लेखक कहते हैं कि यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। यहाँ की पहाड़ी नदियों में पनबिजली परियोजनाओं और सिंचाई नहरों के विकास की व्यापक संभावनाएँ हैं। यह क्षेत्र खनिज संपदा के लिए भी प्रसिद्ध है—कोयला, हीरा (पन्ना) और अन्य बहुमूल्य खनिज यहाँ प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन, राजनीतिक स्वार्थों के कारण बुंदेलखंड प्रांत के निर्माण की माँग ठंडी पड़ गई है।
अंत में, लेखक खमबाबा और विदिशा के ध्वंसावशेषों को देखने के बाद आधुनिक भिलसा कस्बे की ओर लौटते हैं। वे पाते हैं कि प्राचीन विदिशा का क्षेत्र खमबाबा, उदयगिरि और साँची तक फैला हुआ था। भिलसा की जामा मस्जिद 12वीं शताब्दी के एक विशाल मंदिर के स्थान पर बनाई गई थी। इसके भीतर एक लेख अंकित है और दो कब्रों पर सुंदर नक्काशी है, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती है।