महादेवी वर्मा - जीवन परिचय
हिंदी छायावाद के प्रमुख चार आधार स्तंभों में एक, वेदना की कवयित्री, 'आधुनिक-मीरा' के नाम से प्रख्यात महादेवी वर्मा जी को हिंदी साहित्य की अनमोल निधि माना जा सकता है। आपने गद्य और पद्य दोनों में समान योगदान दिया है। सर्वप्रथम इनकी रचनाएँ 'चाँद' नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थीं। महादेवी वर्मा 'चाँद' पत्रिका की संपादिका भी रहीं हैं। महादेवी वर्मा जी को पद्म भूषण तथा पद्म विभूषण की उपाधि से सम्मानित किया गया है। इन्हें भारत-भारती पुरस्कार, 'मंगला प्रसाद' पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। वर्ष 1983 में काव्य ग्रंथ 'यामा' पर इन्हें 'भारतीय ज्ञानपीठ' पुरस्कार प्राप्त हुआ। वे जीवन पर्यंत प्रयाग में रहकर साहित्य साधना करती रहीं।
उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ 'अतीत के चलचित्र', 'स्मृति की रेखाएँ', 'श्रृंखला की कड़ियाँ', 'पथ के साथी', 'क्षणदा', 'साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध', 'संकल्पिता', 'मेरा-परिवार', 'चिंतन के क्षण' आदि प्रसिद्ध गद्य रचनाएँ हैं। इनके अतिरिक्त 'सप्तवर्णा', 'संधिनी', 'सांध्यगीत', 'आधुनिक कवि' नामक गीतों के समूह प्रकाशित हो चुके हैं। महादेवी वर्मा द्वारा अनेक लेखकों, कवियों और प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरण लिखे गए हैं। उनके द्वारा लिखे गए संस्मरणों को विशेष रूप से याद किया जाता है। यह ऐतिहासिक दस्तावेजों की तरह भी रखे जा सकते हैं। महादेवी वर्मा द्वारा लिखा गया यह संस्मरण भी इसी प्रकार से जयशंकर प्रसाद की आखिरी मुलाकात पर आधारित है।
सुंघनी साहू का सार
'सुंघनी साहू' पाठ महादेवी वर्मा द्वारा लिखा गया जयशंकर प्रसाद का संस्मरण है। जयशंकर प्रसाद महादेवी वर्मा के समकालीन थे। वे छायावाद युग के प्रमुख कवि थे। इस संस्मरण में महादेवी वर्मा प्रसाद से अपनी पहली और अंतिम मुलाकात का विस्तार से जिक्र करती हैं और प्रसाद के जीवन में आए संघर्षों एवं उनके साहित्य कला का भी चित्रण करती हैं। महादेवी वर्मा प्रसाद का स्मरण करते हुए कहती हैं कि जब भी प्रसाद के बारे में सोचती हैं, उनके सामने हिमालय की तलहटी में स्थित देवदार के पेड़ का चित्र याद आता है, जो बर्फ, गर्मी, आंधी, तूफानों को झेलते हुए भी कभी नहीं झुका था। मगर उसकी जड़ों से गुजरने वाली पतली जलधारा के कटान के कारण एक दिन वह गिर पड़ा। प्रसाद का जीवन भी उसी देवदार के पेड़ की तरह था।
महादेवी वर्मा कहती हैं कि प्रसाद जी से मेरी मुलाकात किसी काव्य सम्मेलन, किसी संगीत कार्यक्रम या सम्मान समारोह में नहीं हुई थी, बल्कि काशी के उनके साधारण से घर में हुई थी। प्रसाद और महादेवी वर्मा एक-दूसरे से परिचित थे, मगर वे कभी मिल नहीं पाए थे। महादेवी वर्मा का काव्य-संग्रह 'सांध्यगीत' प्रकाशित हो चुका था और प्रसाद 'कामायनी' का दूसरा सर्ग लिख रहे थे।
वे भागलपुर से प्रयाग लौटते हुए प्रसाद जी के दर्शन के लिए काशी (बनारस) में उतरीं। मगर वे बनारस की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में अपरिचित थीं। स्टेशन से बाहर निकलकर वे कई टांगे वालों से प्रसाद के घर का पता पूछती हैं। वे सोचती थीं कि प्रसाद जैसे प्रसिद्ध कवि को हर कोई पहचानता होगा, मगर अफसोस, कोई भी टांगेवाला प्रसाद के नाम से परिचित नहीं था। तब वे निराश होकर वापस स्टेशन के वेटिंग रूम में लौटने ही वाली होती हैं, तभी एक तांगेवाला महादेवी जी से पूछता है, "क्या आपको सुंघनी साहू के घर तो नहीं जाना है?" वे सोचती हैं, "यह कौन है?"
जिस प्रकार जलधारा देवदार के पेड़ की जड़ों को नीचे से खोखला कर देती है और संघर्ष के दिनों में वह आंधी-तूफानों से नहीं लड़ पाता, उसी प्रकार प्रसाद भी बीमारियों से नहीं लड़ पाए थे। छायावादी युग के श्रेष्ठ कवि होने से महादेवी वर्मा का उनसे अपरिचय संभव नहीं था। प्रयाग से काशी दूर नहीं थी। भागलपुर से प्रयाग आते-आते मार्ग में काशी पड़ जाती थी और एक बार प्रसाद जी के दर्शनार्थ वे कुछ घंटों के लिए यात्रा भंग कर प्रसाद से मिलने का मन बनाती हैं। महादेवी को लगा कि प्रसाद को तो कवि के सभी लोग जानते होंगे, लेकिन उन्हें जानने वाला कोई नहीं मिला। रास्ता इतना संकरा और छोटा था कि उस रास्ते से उनके घर तक तांगा भी नहीं पहुंच पाता था।
वहाँ पहुंचकर उन्होंने देखा कि घर सामान्य मध्यम वर्ग के घर जैसा था और सफेद रंग में रंगा हुआ था। प्रसाद जी स्वयं बाहर आए। उनका चित्र उन्हें हृष्ट-पुष्ट स्थिर बताता है, लेकिन उनकी खुद की हर्षित तस्वीर नहीं है। वे उड़ते हुए पर विचित्र दिखते थे। उनकी उपस्थिति शांति का संदेश देती थी। परिस्थितियों की व्याकुलता के बावजूद उनकी संगीतात्मकता और निराली स्वादिष्टता प्रत्यक्ष थी।
प्रसाद जी का योगदान साहित्य के महत्व को उजागर करता है। वे मानते थे कि वर्तमान में नाटकीय कथाएँ इतनी जटिल हो गई हैं कि उन्हें दार्शनिक निष्कर्ष की ओर मोड़ना कठिन होगा। उनका मानना था कि विचार को समझाने के लिए प्राचीनता की मिट्टी की आवश्यकता है, जो नई मूर्तिमत्ता में नहीं होती। उन्होंने स्वयं विश्लेषण किया और वेदिक साहित्य को उनका पसंदीदा विषय माना। प्रसाद जी अपने अत्यल्प शब्दों में बहुत कुछ कहने में सक्षम थे, जो कि अद्भुत था। उनका निधन हिंदी साहित्य के लिए एक दुखद घटना था, लेकिन उनका आदर्शवाद और संदेश हमें हमेशा याद रहेगा।
प्रसाद जी के व्यक्तिगत जीवन का अध्ययन करते समय हमें एक अकेलेपन की अनुभूति होती है, जो किसी अन्य साहित्यकार के जीवन में नहीं मिलती। उन्हें अपने जीवन में कई संघर्षों का सामना करना पड़ा, लेकिन वे निराश नहीं हुए। उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं की चर्चा करते समय हमें एक अद्भुत और आध्यात्मिक दृष्टिकोण मिलता है। वे अपने अंतरंग और बाह्य संघर्षों के बारे में जागरूक थे, और उनकी भावनाएँ उनके लेखन में व्यक्त होती थीं। उनका जीवन हमें अद्भुत और गहरे धार्मिक अनुभवों से सिखाता है। प्रसाद, एक महान कवि और लेखक का जीवन और काम आज भी महत्वपूर्ण है।