Monday, February 17, 2025

‘अकाल-दर्शन’ - सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’

 

अकाल-दर्शन

-      सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’

 अकाल-दर्शन’ कविता ‘प्रश्न’ और ‘आश्चर्य’ की शैली में लिखी गई हैकविता की शुरुआत ही प्रश्न से है –“भूख कौन उपजाता है :”I इस प्रश्न के माध्यम से ही कविता आगे बढ़ती हैकवि व्यवस्था से जानना चाहता है कि आखिर इस अकाल की वजह क्या है? ‘चालाक आदमी’ इस कविता में व्यवस्था(सरकार, सत्ता) का प्रतीक है और उसके पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं हैसत्ता अपना  प्रभुत्व समस्या की मूल वजह से ध्यान हटा कर कायम रखती हैइसकविता का प्रकाशन वर्ष 1972 के आसपास का है। उस समय कुछ दिनों पहले ही इंदिरा गाँधी की कांग्रेस सरकार ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ आई थी और ‘जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम’ भी शुरू हो गया थाभारत-पाकिस्तान के बीच बांग्लादेश युद्ध समाप्त हुआ थाI गरीबीअकालभूखमरी जैसी समस्याओं का कारण बढ़ती हुई जनसंख्या और युद्ध को बताया जा रहा थाअर्थात्  देश की समस्यायों के लिए सरकार या व्यवस्था नहीं बल्कि स्वयं आम लोग या प्रकृति इसके लिए जिम्मेदार हैंI ‘युद्ध’ या ‘अकाल’ व्यवस्थाजनित नहीं बल्कि प्रकृति-जनित हैंसरकार या व्यवस्था का इसमें कोई दोष नहींधूमिल इसी सोच पर प्रहार करते हैंसत्ता के सामने प्रश्न खड़ा करते हैंलेकिन व्यवस्था का प्रतीक ‘चालाक आदमी’  कवि के प्रश्न का उत्तर देने की बजाय –

 उसने गलियों और सड़कों और घरों में

बाढ़ की तरह फैले हुए बच्चों की ओर इशारा किया

और हँसने लगाI

फिर जल्दी से हाथ छुड़ाकर

जनता के हित में’ स्थानान्तरित

हो गया

 

व्यवस्था इतनी चालाक है कि वो दोनों तरह की बात कहने में माहिर हैएक ओर यह व्यवस्था भूख को जन्म देती हैऐसी परिस्थितियाँ पैदा करती हैं कि बेकारी बढ़े,जनसंख्या बढ़े क्योंकि इसी में उनका लाभ हैदूसरी ओर एनजीओ या योजनाओं आदि के माध्यम से एहसान की तरह थोड़ी से मदद करके व्यवस्था अपने प्रति क्रोध को कम करता है। व्यवस्था हमेशा इन समस्याओं की मूल वजह को उजागर होने से रोकती हैI ‘हिजेमनी’ इसी तरह कायम रहती है जहाँ जनता को हमेशा यह लगते रहे कि व्यवस्था जरुर उनके लिए कुछ न कुछ कर रही हैअर्थात् जनता को यह लगना चाहिए कि वर्तमान सत्ता उनका कल्याण कर रही हैI वास्तव में सत्ता को कायम रखने के दो औजार हैं एक ‘सहमति’ से और दूसरा ‘दमन’ सेयह सत्ता को कायम रखने का सबसे सहज रास्ता हैइस सहजता को अगर कोई तोड़ सकता है तो वह बुद्धिजीवी वर्ग  हैसत्ता को ऐसे ही बुद्धिजीवियों से खतरा होता हैइस कविता का कवि ऐसा ही बुद्धिजीवी है जो व्यवस्था की असलियत को समझ गया है –

और सहसा मैंने पाया कि मैं ख़ुद अपने सवालों के

सामने खड़ा हूँ और

उस मुहावरे को समझ गया हूँ

जो आज़ादी और गाँधी के नाम पर चल रहा है

जिससे न भूख मिट रही हैन मौसम

बदल रहा हैI

यह आज़ादी झूठी हैदेश की जनता भूखी है’ नारे की कव्यात्मक व्याख्या का इससे सुन्दर उदाहरण शायद ही किसी वामपंथी कवि के यहाँ मिलेकवि व्यवस्था की उस भाषा को समझ गया है जो ‘राष्ट्रहित’ के आवरण में शोषण के तंत्र को संचालित कर रहा हैयहाँ ‘गाँधी’ शब्द का गाँधीवादी आदर्शों का प्रतीक हैI ‘आदर्शों’ और कोरे ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर चल रही सत्ता की असलियत कवि तो समझ गया लेकिन वो जनता नहीं समझ रही जो अकाल और भूख से मर रही है –

लोग बिलबिला रहे हैं (पेड़ों को नंगा करते हुए)

पत्ते और छाल

खा रहे हैं

मर रहे हैंदान

कर रहे हैI

कवि की चिंता यहीं शुरू होती है कि इन वीभत्स परिस्थितियों के बावजूद जनता में व्यवस्था परिवर्तन के लिए कोई सुगबुगाहट नहीं हैI लोगों का खून गर्म नहीं होता। और नया ही लोग इसके लिए लड़ते हैं। उन्हें इसलिए कवि को यह सब कुछ सामान्य लग रहा है –

जलसों-जुलूसों में भीड़ की पूरी ईमानदारी से

हिस्सा ले रहे हैं और अकाल को सोहर की तरह गा रहे हैंI

झुलसे हुए चेहरों पर कोई चेतावनी नहीं हैI’

कवि चाहता है कि लोगों के भीतर व्यवस्था के प्रति विद्रोह का भाव उत्पन्न हो लेकिन परिस्थितियों ने जनता को ऐसा बना दिया है कि वे भी असली तथ्य के बारे में सुनना या जानना नहीं चाहतेअंधे ‘राष्ट्रवाद’ के कारण उन्हें संभवतः सत्ता विरोधराष्ट्र विरोध के रूप में दिख रहा हैI ‘राष्ट्रवाद’ ऐसा हथियार है जिससे कोई भी व्यवस्था अपने शोषण को सही बताती है और अपने हित को राष्ट्रहित के रूप में प्रस्तुत करती हैजिस समय यह कविता लिखी गयी थीI वह दौर भारत-पाकिस्तान युद्ध का समय था और इंदिरा गाँधी ‘दुर्गा’ के रूप में देश बचा रहीं थीदरअसल जनता अपने ही समस्याओं से ‘अलगाव बोध’ में थीकवि उन्हें समझाने की कोशिश करता है पर वहाँ हर तर्क के ऊपर ‘राष्ट्रवाद’ का तर्क भारी है –

मैंने जब भी उनसे कहा है देश शासन और राशन

उन्होंने मुझे टोक दिया हैI

अक्सरवे मुझे अपराध के असली मुकाम पर

अँगुली रखने से मना करते हैंI

जिनका आधे से ज्यादा शरीर

भेड़ियों ने खा लिया है

वे  इस जंगल की सराहना करते हैं –

भारतवर्ष नदियों का देश हैI    

कवि यहाँ पूरे राष्ट्र को एक जंगल का प्रतीक मानते हुए इसे भेड़ियों का साम्राज्य कहता हैउसकी चिंता यह है कि जो लोग इस जंगलरूपी राष्ट्र में शोषित-पीड़ित हैंवही इसकी प्रशंसा कर रहे हैंइसका कारण सत्ता की ‘हिजेमनी’ है जो इन्हें सत्ता की असलियत समझने नहीं देता –

मगर वे हैं कि असलियत नहीं समझतेI

अनाज में छिपे ‘उस आदमी’ की नीयत

नहीं समझते

जो पूरे समुदाय से

अपनी गिज़ा वसूल करता है –

कभी ‘गाय’ से

और कभी ‘हाय’ से

गिज़ा’  का अर्थ यहाँ भोजन या खुराक से हैIकवि के लिए यह विडम्बनापूर्ण स्थिति है कि लोग सत्ता की असलियत नहीं समझ रहे हैं जबकि पूरी सत्ता जनता के शोषण से संचालित हैयह सत्ता कभी धर्म से तो कभी डर के माध्यम से लोगों का शोषण कर रही हैयहाँ ‘गाय’  साम्प्रदायिक विभाजन  का प्रतीक हैI ‘हाय’ यहाँ देश के ऊपर खतरे का प्रतीक हैअर्थात् व्यवस्था कभी बाहरी तो कभी भीतरी काल्पनिक खतरों का भय दिखाकर अपने तंत्र को बरकरार रखे हुए हैकवि जनता को इस  प्रजातांत्रिक व्यवस्था की गैर-बराबरी को सरल शब्दों में समझाने का प्रयास करता है –

वह कौन-सा प्रजातांत्रिक नुस्खा है

कि जिस उम्र में

मेरी माँ का चेहरा

झुर्रियों की झोली बन गया है

उसी उम्र की मेरे पड़ोस की महिला

के चेहरे पर

मेरी प्रेमिका के चेहरे-सा

लोच है

कवि जीवन के अंतरंग अनुभवों से व्यवस्था की असलियत को रखता हैयहाँ नारी  सौन्दर्य के माध्यम से सत्ता की कुरूपता को सामने रखा गया हैपरन्तु सत्ता का तिलिस्म तोड़ना कोई आसान कार्य नहीं हैवास्तव में जो आलोचक धूमिल की इस बात के लिए आलोचना करते हैं कि उन्हें जनता पर विश्वास नहींवैसे आलोचक इस बात को भूल जाते हैं कि जनता अपनी समस्याओं से त्रस्त है और क्रांति के लिए जनता को तैयार करना एक कठिन कार्य हैधूमिल की कविता खासकर ‘अकाल-दर्शन’ इसी कठिनाई को व्यक्त करती है-

वे चुपचाप सुनते हैंI

उनकी आँखों में विरक्ति है ;

पछतावा है ;

संकोच है

या क्या है कुछ पता नहीं चलताI

वे इस कदर पस्त है :

कि तटस्थ हैंI

जनता में चाहे कितनी ही शक्ति हो पर उसका ‘अलगाव बोध’ उसे व्यवस्था परिवर्तन से रोकता हैजनता इसलिए ‘तटस्थ’ या ‘पस्त’ नहीं है कि वो कुछ कर नहीं सकतीवास्तव में व्यवस्था के ‘हिजेमनी’ से वो भ्रमित हैI ‘क्या करें’ यह उसके सामने प्रश्न हैकोई भी ईमानदार कवि यह कहकर इस प्रश्न से भाग नहीं सकता कि उसे जनता पर पूर्ण विश्वास है और जनता क्रांति करने जा रही हैयह सच्चाई है कि ऐसे तमाम विश्वासों के बावजूद व्यवस्था में कोई आमूलचूल परिवर्तन नहीं हुआ हैकुछ बड़े आंदोलनों के बावजूद व्यवस्था का स्वरुप जस का तस बना है और आखिर ऐसा क्यों हैइस प्रश्न का उत्तर धूमिल की कविताओं की गहराई में जाकर जाना जा सकता हैधूमिल ‘अकाल-दर्शन’ की आखिरी पंक्तियों में सत्ता की ‘हिजेमनी’ और क्रांति के संबंधों की सुन्दर प्रस्तुति करते हैं –

और मैं सोचने लगता हूँ कि इस देश में

एकता युद्ध की और दया

अकाल की पूँजी हैI

क्रांति-

यहाँ के असंग लोगों के लिए

किसी अबोध बच्चे के –

हाथों की जूजी हैI

 क्रांति के लिए आम जनता की ‘एकता’ और परस्पर सहानुभूति का भाव अनिवार्य शर्तें  हैंपरन्तु विडम्बना यह है कि सत्ता द्वारा शुरू किये गए युद्धों के समय ही एकता उत्पन्न होती हैअर्थात् ‘राष्ट्रवाद’ या ‘अकाल’ जैसा राष्ट्रीय आपात ही यहाँ एकता और सहानुभूति पैदा करते हैंभारतीय जनमानसको अपने वास्तविक शक्ति का पता ही नहींजिस प्रकार किसी छोटे बच्चे को दुनिया की समझ नहीं होतीउसी तरह क्रांति की धारणा के सन्दर्भ में भारतीय जनता अभी कमजोर है धूमिल का उद्देश्य कहीं से भी जनता की ताकत को कम करके आंकना नहीं हैबल्कि वे इस बात से व्यथित हैं कि जनता को अपनी शक्ति का बोध क्यों नहीं है ? धूमिल ‘अकाल-दर्शन’ द्वारा सत्ता और जनता की चेतना के द्वन्द्व से क्रांति के दर्शन की खोज करते हैंजनमानस पर सत्ता के प्रभुत्व यानि ‘हिजेमनी’ और स्वयं जनता का अपनी वीभत्स परिस्थितियों से ‘अलगाव’ की व्याख्या के बिना किसी क्रांति की कल्पना नहीं की जा सकतीधूमिल का काव्य क्रांति की राह के रोड़ों से टक्कर द्वारा निर्मित हैजिसका ‘अकाल-दर्शन’  प्रतिनिधित्व करता हैI