Monday, July 28, 2025
Tuesday, April 8, 2025
गुळ्ळकायजी नाटक - चंद्रशेखर कम्बार Gullakayaji - Chandrashekhar Kambar
गुळ्ळकायजी नाटक - चंद्रशेखर कम्बार Gullakayaji - Chandrashekhar Kambar
गुळ्ळकायजी नाटक का सार लिखिए।
गुळ्ळकायजी नाटक के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
गुळ्ळकायजी नाटक में चित्रित पात्रों वर्णन कीजिए।
'गुळ्ळकायजी' चंद्रशेखर कम्बार द्वारा लिखा गया एक नाटक है जो भद्रबाहु बाहुबली महाराज के ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है। जब चावुंड़राय अपनी माँ काळलदेवी के साथ भद्रबाहु की गुफा की ओर जाता है तो भागवत कथा सुना रहे थे। उन्होंने वृषभदेव के पुत्र भरत और बाहुबली की कथा सुनाई। जब भरत विश्वविजय कर बाहुबली के राज्य को जितने की मंशा से पौदनपुर आते हैं तो भरत और बाहुबली में युद्ध होता है। बाहुबली महाराज पौदनपुर के महान राजा थे। उन्होंने अपने भाई भारत से दृष्टियुद्ध, जलयुद्ध और मलयुद्ध युद्ध किया और युद्ध जीत लिया। जैसा की तय हुआ था भरत को अपना राज्य त्यागना था हालांकि, जब उनके भाई के आंसू बाहुबली के पैरों पर गिरे, तो बाहुबली ने अपने भाई के लिए अपना राज्य छोड़ने का निर्णय लिया। और एक वर्ष तक जंगल में तपस्या करते रहे। बाहुबली महाराज की याद में, उनके भाई ने बाहुबली की 60 फीट ऊंची मूर्ति बनाई, जो एक ही पत्थर से तराशी गई थी। चावुंड़राय अपनी माँ काळलदेवी के साथ के साथ उस मूर्ति को देखने गए, तो वह मूर्ति वहाँ नहीं मिली। एक रात, एक देवी ने चावुंड़राय और उनकी काळलदेवी के सपने में आकर उन्हें श्रवणबेलगोला में ही 60 फीट ऊंची मूर्ति बनाने का आदेश दिया। चावुंड़राय को यह समझ नहीं आया कि इसे कैसे किया जाए। देवी ने उन्हें एक छोटे पहाड़ पर जाने और एक बड़े पहाड़ की ओर तीर चलाने के लिए कहा, और फिर बाहुबली की मूर्ति प्रकट हो जाएगी।
अगली सुबह, चावुंड़राय, सफेद धोती और कुर्ता पहने हुए, अपनी काळलदेवी और परिवार के साथ एक छोटे पहाड़ के केंद्र में गए और तीर चलाया। तुरंत, एक बड़ा पत्थर उस पहाड़ पर दिखाई दिया। फिर चावुंड़राय ने एक शिल्पकार की तलाश शुरू की जो उस मूर्ति को तराश सके।
एक दिन, चावुंड़राय के मंत्री ने शिल्पकार के घर जाकर पूछा कि क्या बूढ़ीया शिल्पकार ने इस कार्य को स्वीकार किया है। शिल्पकार की अनुमति के बिना, बूढ़ीया या ने मंत्री से कहा कि शिल्पकार बाहुबली की 60 फीट ऊंची मूर्ति बनाने के लिए तैयार था। हालांकि, शिल्पकार को यह नहीं पता था कि उसे इस काम को कैसे करना चाहिए। उसे मूर्ति के माप या एक ही पत्थर से इतनी बड़ी मूर्ति को तराशने की तकनीक का ज्ञान नहीं था।
शिल्पी ने अपनी बात बताई की किस प्रकार से उसके पिता की मुत्यु उसके कारण हो गई थी। जब शिल्पी अपने पिता को खोजें उत्तर देश गया तो उसके पिता ने उसे एक देवी की मूर्ति दिखाई इसपर शिल्पी ने कहा इस मूर्ति की आंखे तो है लेकिन इसकी दृष्टि नहीं है। इस बात से नाराज होकर पिता ने आत्महत्या कर की और यह संदेश जब शिल्पी ने माँ को दिया तो वह भी दुख से मर गई। इसलिए शिल्पी कहता की अब तो पिता भी नहीं है की वे मुझे यह मूर्ति बनाने के लिए अपना अनुभव बताते मुझे मार्गदर्शन करते।
जब शिल्पी मान नहीं रहा था तो बूढ़ीया ने शिल्पकार को तपस्या करने और बाहुबली महाराज से मार्गदर्शन प्राप्त करने की सलाह दी। उनकी सलाह के अनुसार, शिल्पकार ने तीन दिन तपस्या (ध्यान) किया। पहले दिन वह बहुत डर गया था। दूसरे दिन उसे भूख और प्यास साता रही थी तीसरे दिन वह सोच रहा था की अब बाहुबली महाराज प्रसन्न नहीं हुए तो मैं यहीं बड़े पत्थर से कूदकर जान दे दूँगा। और शिल्पी बाहुबली महाराज से प्रार्थना करने लगा। उसकी तपस्या के दौरान, बाहुबली महाराज ने उसे दर्शन दिए और पूछा की तुम्हें क्या चाहिए। प्रसिद्धि देखने की आँख चाहिए या मुझे देखने की आँख चाहिए। जब शिल्पी ने बताया की मुझे देखने की आँख चाहिए और 60 फीट की मूर्ति को तराशने का तरीका बताया। दर्शन देने के बाद, बाहुबली महाराज उसी 60 फीट के पत्थर में विलीन हो गए। शिल्पकार ने 12 वर्षों तक कठिन परिश्रम किया और बाहुबली की शानदार मूर्ति बनाई, जो अब उदयगिरी पर्वत पर गर्व से खड़ी है। चंदरगिरी पर्वत पर बनी मूर्ति इतनी बड़ी और ऊंची है कि दूर से लोग और महिलाएं छोटे चींटी की तरह दिखाई देते हैं।
एक दिन, चावुंड़राय ने महामस्तकाभिषेक का आयोजन करने का निर्णय लिया। महामस्तकाभिषेक का आयोजन किया गया और उसमें कई गणमान्य व्यक्तियों को आमंत्रित किया गया। जिसमें दानचिन्तामनी अत्तीमब्बे जो सेनापती नागदेव की पत्नी थी। और अहिंसा की प्रचारक थी। अत्तीमब्बे ने हजारों मूर्तियां और धार्मिक किताबों को लोगों में बांटने का काम लिया था। और वे कई लोगों को मार्गदर्शन कर रही थी। इसी के साथ कवि रन्न भी पधारे थे। कवि रन्न जब चावुंड़राय से मिलते हैं तो दोनों में विचारविनिमय होता है। कवि रन्न 'अजितनाथ तीर्थंकर चरित' लिखना चाह रहे थे जो कवि पंप के 'आदिनाथ पुराण' से प्रेरित है। और यह कार्य बाहुबली स्वामी के मूर्ति के निर्माण से पहले लिखना चाह रहे थे। लेकिन रन्न का कहना है की शिल्पी ने मूर्ति बनाने का कार्य इतने तेजी से किया की रन्न का 'अजितनाथ तीर्थंकर चरित' ग्रंथ पूरा भी नहीं हो पाया है। इस बीच दानचिन्तामनी अत्तीमब्बे कवि रन्न की मुलाकात चंद्रगुप्त बसदी के पास होती है वहीं पर चावुंड़राय यह योजना बताते हैं की वह शिल्पी का सम्मान दानचिन्तामनी अत्तीमब्बे के हाथों से करना चाहेगा। इसे अत्तीमब्बे बी बड़े दिल से स्वीकार करती हैं। और शिल्पी और बूढ़ी माँ को यह सन्देशा भेजती है की अत्तीमब्बे आपसे और बूढ़ी माँ से मिलना चाहती है। शिल्पी यह संदेश सुनकर शिल्पी बूढ़ी माँ के साथ अत्तीमब्बे को मिलने पहुँच जाता है।
अत्तीमब्बे शिल्पी और बूढ़ी माँ से मिलकर बहुत खुश हो जाती है। और बतलाती है की किस प्रकार से उनके बटे ने एक महान कार्य किया है। जिसके लिए बूढ़ी माँ ने भी लगातार 12 वर्ष तक उसे बड़ा पहाड़ चढ़कर खाना किया था। इसलिए अत्तीमब्बे शिल्पी और बूढ़ी माँ का धन्यवाद करती है और शिल्पी को सम्मानित करने की बात बतलाती है। शिल्पकार को उसके कार्य के लिए सम्मानित किया जाता है। हालांकि, शिल्पकार ने चावुंड़राय से सोने के सिक्कों का कोई भुगतान या सोने की मुद्राएं स्वीकार करने से इनकार कर दिया। शिल्पी यह स्पष्ट करना चाहता था की वह ऐसा क्यों कर रहा है, और वह यह भी कहता है की अन्य शिल्पियों को भी सम्मानित किया जाना चाहिए। चावुंड़राय शिल्पी का नाम मूर्ति के नीचे लिखना चाहते हैं लेकिन शिल्पी नाम भी नहीं लिखवाना चाहता है। उसके अनुवास इसीसे बाहुबली स्वामी नाराज हो जाएंगे। इससे चावुंड़राय समझ ने लगा था की शिल्पी बड़ा अहंकारी हो गया है। लेकिन शिल्पी ने अपनी बूढ़ी माँ से वचन लिया था की अगर वह बाहुबली स्वामी की मूर्ती पर उसी प्रकार की मुस्कान उकेरने में सफल होगा जो उसने तीन दिन की तपस्या के समय देखी थी तो वह किसी से कोई पारिश्रमिक नहीं लेगा। चावुंड़राय शिल्पकार के इनकार से बहुत गुस्से में आ गए और उन्होंने उसे और उसकी बूढ़ी माँ को वहां से जाने का आदेश दिया। चावुंड़राय ने मंत्री को आदेश दिया की महामस्तकाभिषेक समारोह में किसी भी बात की कमी नहीं होनी चाहिए नहीं तो वे क्रोध का कारण बनेंगे।
महामस्तकाभिषेक समारोह में गुळ्ळकायजी भी आयी हैं। महामस्तकाभिषेक समारोह के दौरान, मूर्ति को दूध, गन्ने का रस, पानी, नारियल पानी, कषाय, हल्दी का लेप और अन्य अर्पणों से स्नान कराया गया। तीन दिन बीत गए, लेकिन मूर्ति पूरी तरह से मूर्ति पूरी तरह नहीं भीग पा रही थी। चावुंड़राय और भक्ति भाव से आए बाहुबली स्वामी के भक्तगण इस दोष के कारण डरे हुए हैं। वे सोच रहे हैं की शायद भविष्य में कोई बुरी घटना घटने वाली हैं और इसलिए मूर्ति पूरी तरह नहीं भीग रही है। चावुंड़राय वहाँ आए सभी जनों से अनुरोध कर रहे हैं की अगर किसी को कोई समाधान पता हो तो कृपया बताए कोई शास्त्र, तोते का शास्त्र हो तो बताएं। इसबीच चावुंड़राय देखते हैं की एक बूढ़ीया कटोरे में दूध लेकर ऊपर जा रही हैं और चावुंड़राय उस बूढ़ीया को ऊपर जाने से रोक दिया जाता है। बूढ़ी माँ नीचे आ जाती है। इसपर अत्तीमब्बे और रन्न कवि चावुंड़राय को सलाह देते हैं कि बाकी शिल्पियों का भी वे सम्मान करें। इसपर भी चावुंड़राय मान जाते हैं।
चावुंड़राय जब बूढ़े लोगों से बातचीत कर रहा था उसी समय एक बुजुर्ग ने बताया की एक व्यक्ति यह कहता हुआ क्रोध से चला गया कि वह अहंकारी है, अहंकार भरा है। चावुंड़राय इसकी पुछताज करता है की वह कौन था कहाँ से आया था। और किसी ने उसे देखा या नहीं। कुछ लोग यह भी कहा जा ता है की वह व्यक्ति श्रवण बेलगोल का नहीं लगता था। चावुंड़राय को अब भी लगता है शिल्पी की वजह से ही मूर्ति कामहामस्तकाभिषेक समारोह सम्पन्न नहीं हो पा रहा है। इसपर अत्तीमब्बे कहती है कि कुछ भी हो आपको बूढ़ी माँ को ऊपर जाकर उसकी मन्नत पूरी करने की अनुमति देनी चाहिए दंडनायक जी। क्योंकि 12 साल तक उस बुढी माँ ने शिल्पी को खाना खिलाया 12 साल तक वह उस पहाड़ पर चढ़कर शिल्पी को मूर्ति बनाने के लिए मदद की। कुछ भी हो सबसे चावुंड़राय जी हमें महामस्तकाभिषेक समारोह में आए व्यत्यय को, बुरे शकुन को दूर करने का प्रयास करना चाहिए चावुंड़राय इस बात को मानता है। लेकिन यह देखने के लिए की एक दूध बेचने वाली बूढ़ी गरीब महिला बाहुबली महाराज के महामस्तकाभिषेक के लिए जा रही है और वह आँगन में जाकर खड़ा हो जाता है।
बूढ़ी माँ गुळ्ळकायजी जब छोटे कटोरे में दूध की धार बाहुबली के मस्तिष्क पर बहाती है तो वह छोटी धार बड़ी धार में बदल जाती है और उस बड़ी धारा से बाहुबली स्वामी का पूरा शरीर भीग जाता है। जिसे सभी बाहुबली स्वामी के भक्त आनंदित हो जाते हैं और बाहुबली महाराज की जय जयकार करने लगते हैं। बाहुबली स्वामी की जय जयकार सुनकर चावुंड़राय को भी याद आता है की गुळ्ळकायजी की आवाज और सपनों में आयी देवी माँ की आवाज तो एक ही हैं। वह दौड़कर ऊपर आ जाता है। गुळ्ळकायजी जो ऊपर स्वामी के सर पर दूध बहाने के लिए ऊपर गई थी वह अब कमजोर और अशक्त हो गई थी। शिल्पी उसे उठाकर लाता है और मूर्ति के चरणों के पास लाकर बिठाता है। चावुंड़राय माफी मांगने लगता है की हे देवी माँ मुझे माफ कीजिए मैं आपको पहचान न सका। इस प्रकार गुळ्ळकायजी ने चावुंड़राय का अहंकार दूर किया था। इसप्रज सभी लोग गुळ्ळकायजी की भी जय जयकार करने लगते हैं। उसी समय गुळ्ळकायजी जहां बैठी थी वहीं अपने प्राण त्याग देती हैं। शिल्पी वहाँ से चला जाता है। सभी लोग बाहुबली की जय जयकार करने लगते हैं। नाटक समाप्त होता है।
गुळ्ळकायजी नाटक - चंद्रशेखर कम्बार
Gullakayaji - Chandrashekhar Kambar
Wednesday, April 2, 2025
विदिशा की ओर - राहुल सांकृत्यायन
विदिशा की ओर - राहुल सांकृत्यायन
1.'विदिशा की ओर' यात्रा का सार लिखिए।
2.राहुल सांकृत्यायन की 'विदिशा की ओर' यात्रा का विस्तृत सारांश लिखिए।
3.प्राचीन 'विदिशा' नगरी के ऐतिहासिक, धार्मिक एवं आर्थिक महत्व को स्पष्ट कीजिए।
4.विदिशा और दशार्ण के द्वारा राहुल सांकृत्यायन ने भाषा और भारतीय राजनीति पर अपने कैसे विचार किए है स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - राहुल सांकृत्यायन परिचय(1893-1963) :
राहुल
सांकृत्यायन उच्चकोटि के विद्वान् और अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे।
आप का वास्तविक नाम केदारनाथ पांडे था। इन्होंने संस्कृत ग्रन्थों को हिन्दी टीकाएँ
कीं, कोशग्रन्थ तैयार किए तथा तिब्बती भाषा और 'तालपोथी' आदि पर दक्षतापूर्वक लिखा है। वस्तुतः यह सब
उनकी बहुमुखी प्रतिभा का परिचायक है। राहुल जी को सबसे अधिक सफलता यात्रा- साहित्य लिखने में मिली है। आपकी प्रमुख
रचनाएँ हैं 'सतमी के बच्चे', 'वोल्गा
से गंगा', 'कनैल की
कथा'(कहानियाँ), 'विस्मृत यात्री', 'मेरी जीवन-यात्रा', 'असहयोग
के मेरे साथी'(जीवनी साहित्य), 'मेरी लद्दाख यात्रा', 'मेरी
तिब्बत यात्रा', 'यात्रा के पन्ने', 'रूस
में पच्चीस मास', 'घुमक्कड़शास्त्र' (यात्रा साहित्य)आदि।
राहुल सांकृत्यायन अपनी यात्रा के दौरान दशार्ण (वर्तमान भोपाल) पहुँचे, जहाँ उन्हें अगली गाड़ी के लिए तीन घंटे प्रतीक्षा करनी पड़ी। इसके बाद वे साँची और भिलसा (विदिशा) की ओर रवाना हुए। भिलसा में उन्हें वहाँ के लोग अधिक चुस्त और सक्रिय लगे। स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट बाबूराव सूर्यवंशी स्टेशन पर अतिथियों को लेने आए थे, परंतु उनके स्थान पर क्षीरोद बाबू और जयचंद्र विद्यालंकार उपस्थित थे। उन्होंने भिलसा के अतिथिभवन में ठहरने की अच्छी व्यवस्था का अनुभव किया। फिर वे 'खमबाबा' नामक स्थान पर पहुँचे, जहाँ प्रसिद्ध ग्रीक वैष्णव हेलियोदोर द्वारा स्थापित गरुड़ स्तंभ स्थित था। यह स्तंभ इस बात का प्रमाण था कि एक विदेशी ग्रीक राजा का दूत भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर वैष्णव बना था।
इसके बाद वे बेसनगर (प्राचीन विदिशा) गए, जो बेतवा और वेस नदियों के बीच स्थित था। यह प्राचीन काल में एक समृद्ध नगरी थी और ऐतिहासिक खुदाई से यहाँ की प्राचीन संस्कृति की झलक मिलती है। हालांकि, ऐसे ध्वंसावशेष पूरे देश में बिखरे हुए हैं और उनकी खुदाई व संरक्षण देश की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। उन्होंने गुप्तकाल में भी इस नगर की समृद्धि के संकेत देखे और ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक में वर्णित विदिशा की छवि उनकी स्मृतियों में उभर आई। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इन ध्वंसावशेषों में इस प्राचीन नगरी का पूरा इतिहास छिपा हुआ है।
विदिशा प्राचीन काल में केवल एक राजधानी के रूप में प्रसिद्ध नहीं थी, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र भी थी। यह नगर पश्चिमी समुद्र और दक्षिणापथ की ओर जाने वाले दो प्रमुख वणिकपथों के संगम पर स्थित था। इन व्यापार मार्गों के माध्यम से मथुरा, ग्वालियर, विदिशा, उज्जैन और माहिष्पति होते हुए व्यापारी भड़ौच (भरुकच्छ) और सोपारा (सुप्पारक) जैसे बंदरगाहों तक पहुँचते थे। इन बंदरगाहों से भारत का व्यापार अफ्रीका, मेसोपोटामिया, मिस्र और ग्रीस जैसे देशों से होता था। विशेष रूप से, रोमन सोने के सिक्कों का भारत में आगमन इसी मार्ग से होता था, जो इस व्यापारिक मार्ग के महत्त्व को दर्शाता है।
विदिशा न केवल व्यापारिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण थी। इस नगर का संबंध प्राचीन भारत के 'कौशांबी', श्रावस्ती, साकेत, पाटलिपुत्र और राजगृह—से था। यहाँ के ध्वंसावशेष आज भी इसके गौरवशाली अतीत की झलक प्रस्तुत करते हैं। विदिशा से कौशांबी जाने वाला मार्ग अत्यधिक प्रचलित था और इस पर वनकौशांबी तथा वनश्रावस्ती जैसे नगर थे। बौद्ध ग्रंथ ‘त्रिपिटक’ में इसे तुम्बव नगर या पवन नगर के नाम से जाना जाता था। यह वणिकपथ विंध्य पर्वत श्रृंखला से होकर गुजरता था और आधुनिक काल में इसे खोजने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में चंदेरी, देवगढ़, पपोरा, और खजुराहो जैसे प्राचीन नगर इसी मार्ग की जानकारी देने में सहायक हो सकते हैं।
लेखक का मत है कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए भाषा के आधार पर प्रांतों का पुनर्गठन आवश्यक है। यदि लोग अपनी भाषाई इकाइयों के आधार पर इतिहास के अध्ययन को आगे बढ़ाएँ, तो वे अपने अतीत की खोज में अधिक रुचि लेंगे। आर्थिक समृद्धि के लिए भी भाषायी आधार पर प्रांतों का पुनर्गठन आवश्यक है, ताकि कृषि और औद्योगिक योजनाओं को प्रभावी रूप से लागू किया जा सके। लेखक अंग्रेजों द्वारा किए गए प्रांतीय विभाजन की आलोचना करते हैं और इसे अव्यवस्थित मानते हैं। वे प्रश्न उठाते हैं कि यदि हिंदी को आधार मानकर प्रांतों का निर्माण किया जा रहा है, तो फिर राजस्थान, मध्य भारत, मध्य प्रदेश, विन्ध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, भोपाल और हिमाचल प्रदेश को अलग-अलग रखने की क्या आवश्यकता है? उनका तर्क है कि प्राचीन दशार्ण या आधुनिक बुंदेलखंड क्षेत्र का एक स्वतंत्र प्रांत के रूप में गठन आवश्यक है। बुंदेलखंड को एक स्वतंत्र प्रांत बनाने का तर्क देते हुए लेखक कहते हैं कि यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। यहाँ की पहाड़ी नदियों में पनबिजली परियोजनाओं और सिंचाई नहरों के विकास की व्यापक संभावनाएँ हैं। यह क्षेत्र खनिज संपदा के लिए भी प्रसिद्ध है—कोयला, हीरा (पन्ना) और अन्य बहुमूल्य खनिज यहाँ प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन, राजनीतिक स्वार्थों के कारण बुंदेलखंड प्रांत के निर्माण की माँग ठंडी पड़ गई है।
अंत में, लेखक खमबाबा और विदिशा के ध्वंसावशेषों को देखने के बाद आधुनिक भिलसा कस्बे की ओर लौटते हैं। वे पाते हैं कि प्राचीन विदिशा का क्षेत्र खमबाबा, उदयगिरि और साँची तक फैला हुआ था। भिलसा की जामा मस्जिद 12वीं शताब्दी के एक विशाल मंदिर के स्थान पर बनाई गई थी। इसके भीतर एक लेख अंकित है और दो कब्रों पर सुंदर नक्काशी है, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती है।
Monday, February 17, 2025
सुंघनी साहू - महादेवी वर्मा
महादेवी वर्मा - जीवन परिचय
हिंदी छायावाद के प्रमुख चार आधार स्तंभों में एक, वेदना की कवयित्री, 'आधुनिक-मीरा' के नाम से प्रख्यात महादेवी वर्मा जी को हिंदी साहित्य की अनमोल निधि माना जा सकता है। आपने गद्य और पद्य दोनों में समान योगदान दिया है। सर्वप्रथम इनकी रचनाएँ 'चाँद' नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थीं। महादेवी वर्मा 'चाँद' पत्रिका की संपादिका भी रहीं हैं। महादेवी वर्मा जी को पद्म भूषण तथा पद्म विभूषण की उपाधि से सम्मानित किया गया है। इन्हें भारत-भारती पुरस्कार, 'मंगला प्रसाद' पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। वर्ष 1983 में काव्य ग्रंथ 'यामा' पर इन्हें 'भारतीय ज्ञानपीठ' पुरस्कार प्राप्त हुआ। वे जीवन पर्यंत प्रयाग में रहकर साहित्य साधना करती रहीं।
उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ 'अतीत के चलचित्र', 'स्मृति की रेखाएँ', 'श्रृंखला की कड़ियाँ', 'पथ के साथी', 'क्षणदा', 'साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध', 'संकल्पिता', 'मेरा-परिवार', 'चिंतन के क्षण' आदि प्रसिद्ध गद्य रचनाएँ हैं। इनके अतिरिक्त 'सप्तवर्णा', 'संधिनी', 'सांध्यगीत', 'आधुनिक कवि' नामक गीतों के समूह प्रकाशित हो चुके हैं। महादेवी वर्मा द्वारा अनेक लेखकों, कवियों और प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरण लिखे गए हैं। उनके द्वारा लिखे गए संस्मरणों को विशेष रूप से याद किया जाता है। यह ऐतिहासिक दस्तावेजों की तरह भी रखे जा सकते हैं। महादेवी वर्मा द्वारा लिखा गया यह संस्मरण भी इसी प्रकार से जयशंकर प्रसाद की आखिरी मुलाकात पर आधारित है।
सुंघनी साहू का सार
'सुंघनी साहू' पाठ महादेवी वर्मा द्वारा लिखा गया जयशंकर प्रसाद का संस्मरण है। जयशंकर प्रसाद महादेवी वर्मा के समकालीन थे। वे छायावाद युग के प्रमुख कवि थे। इस संस्मरण में महादेवी वर्मा प्रसाद से अपनी पहली और अंतिम मुलाकात का विस्तार से जिक्र करती हैं और प्रसाद के जीवन में आए संघर्षों एवं उनके साहित्य कला का भी चित्रण करती हैं। महादेवी वर्मा प्रसाद का स्मरण करते हुए कहती हैं कि जब भी प्रसाद के बारे में सोचती हैं, उनके सामने हिमालय की तलहटी में स्थित देवदार के पेड़ का चित्र याद आता है, जो बर्फ, गर्मी, आंधी, तूफानों को झेलते हुए भी कभी नहीं झुका था। मगर उसकी जड़ों से गुजरने वाली पतली जलधारा के कटान के कारण एक दिन वह गिर पड़ा। प्रसाद का जीवन भी उसी देवदार के पेड़ की तरह था।
महादेवी वर्मा कहती हैं कि प्रसाद जी से मेरी मुलाकात किसी काव्य सम्मेलन, किसी संगीत कार्यक्रम या सम्मान समारोह में नहीं हुई थी, बल्कि काशी के उनके साधारण से घर में हुई थी। प्रसाद और महादेवी वर्मा एक-दूसरे से परिचित थे, मगर वे कभी मिल नहीं पाए थे। महादेवी वर्मा का काव्य-संग्रह 'सांध्यगीत' प्रकाशित हो चुका था और प्रसाद 'कामायनी' का दूसरा सर्ग लिख रहे थे।
वे भागलपुर से प्रयाग लौटते हुए प्रसाद जी के दर्शन के लिए काशी (बनारस) में उतरीं। मगर वे बनारस की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में अपरिचित थीं। स्टेशन से बाहर निकलकर वे कई टांगे वालों से प्रसाद के घर का पता पूछती हैं। वे सोचती थीं कि प्रसाद जैसे प्रसिद्ध कवि को हर कोई पहचानता होगा, मगर अफसोस, कोई भी टांगेवाला प्रसाद के नाम से परिचित नहीं था। तब वे निराश होकर वापस स्टेशन के वेटिंग रूम में लौटने ही वाली होती हैं, तभी एक तांगेवाला महादेवी जी से पूछता है, "क्या आपको सुंघनी साहू के घर तो नहीं जाना है?" वे सोचती हैं, "यह कौन है?"
जिस प्रकार जलधारा देवदार के पेड़ की जड़ों को नीचे से खोखला कर देती है और संघर्ष के दिनों में वह आंधी-तूफानों से नहीं लड़ पाता, उसी प्रकार प्रसाद भी बीमारियों से नहीं लड़ पाए थे। छायावादी युग के श्रेष्ठ कवि होने से महादेवी वर्मा का उनसे अपरिचय संभव नहीं था। प्रयाग से काशी दूर नहीं थी। भागलपुर से प्रयाग आते-आते मार्ग में काशी पड़ जाती थी और एक बार प्रसाद जी के दर्शनार्थ वे कुछ घंटों के लिए यात्रा भंग कर प्रसाद से मिलने का मन बनाती हैं। महादेवी को लगा कि प्रसाद को तो कवि के सभी लोग जानते होंगे, लेकिन उन्हें जानने वाला कोई नहीं मिला। रास्ता इतना संकरा और छोटा था कि उस रास्ते से उनके घर तक तांगा भी नहीं पहुंच पाता था।
वहाँ पहुंचकर उन्होंने देखा कि घर सामान्य मध्यम वर्ग के घर जैसा था और सफेद रंग में रंगा हुआ था। प्रसाद जी स्वयं बाहर आए। उनका चित्र उन्हें हृष्ट-पुष्ट स्थिर बताता है, लेकिन उनकी खुद की हर्षित तस्वीर नहीं है। वे उड़ते हुए पर विचित्र दिखते थे। उनकी उपस्थिति शांति का संदेश देती थी। परिस्थितियों की व्याकुलता के बावजूद उनकी संगीतात्मकता और निराली स्वादिष्टता प्रत्यक्ष थी।
प्रसाद जी का योगदान साहित्य के महत्व को उजागर करता है। वे मानते थे कि वर्तमान में नाटकीय कथाएँ इतनी जटिल हो गई हैं कि उन्हें दार्शनिक निष्कर्ष की ओर मोड़ना कठिन होगा। उनका मानना था कि विचार को समझाने के लिए प्राचीनता की मिट्टी की आवश्यकता है, जो नई मूर्तिमत्ता में नहीं होती। उन्होंने स्वयं विश्लेषण किया और वेदिक साहित्य को उनका पसंदीदा विषय माना। प्रसाद जी अपने अत्यल्प शब्दों में बहुत कुछ कहने में सक्षम थे, जो कि अद्भुत था। उनका निधन हिंदी साहित्य के लिए एक दुखद घटना था, लेकिन उनका आदर्शवाद और संदेश हमें हमेशा याद रहेगा।
प्रसाद जी के व्यक्तिगत जीवन का अध्ययन करते समय हमें एक अकेलेपन की अनुभूति होती है, जो किसी अन्य साहित्यकार के जीवन में नहीं मिलती। उन्हें अपने जीवन में कई संघर्षों का सामना करना पड़ा, लेकिन वे निराश नहीं हुए। उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं की चर्चा करते समय हमें एक अद्भुत और आध्यात्मिक दृष्टिकोण मिलता है। वे अपने अंतरंग और बाह्य संघर्षों के बारे में जागरूक थे, और उनकी भावनाएँ उनके लेखन में व्यक्त होती थीं। उनका जीवन हमें अद्भुत और गहरे धार्मिक अनुभवों से सिखाता है। प्रसाद, एक महान कवि और लेखक का जीवन और काम आज भी महत्वपूर्ण है।
‘अकाल-दर्शन’ - सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’
‘अकाल-दर्शन’
-
सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’
अकाल-दर्शन’ कविता ‘प्रश्न’ और ‘आश्चर्य’ की शैली में लिखी गई हैI कविता की शुरुआत ही प्रश्न से है –“भूख कौन उपजाता है :”I इस प्रश्न के माध्यम से ही कविता
आगे बढ़ती हैI कवि व्यवस्था से जानना चाहता है
कि आखिर इस अकाल की वजह क्या है? ‘चालाक
आदमी’ इस कविता में व्यवस्था(सरकार,
सत्ता) का प्रतीक है और उसके पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं हैI सत्ता अपना प्रभुत्व समस्या की मूल वजह से
ध्यान हटा कर कायम रखती हैI इसकविता
का प्रकाशन वर्ष 1972 के आसपास का है। उस समय कुछ दिनों पहले ही इंदिरा गाँधी की
कांग्रेस सरकार ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ आई थी और ‘जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम’ भी शुरू हो गया थाI भारत-पाकिस्तान के बीच
बांग्लादेश युद्ध समाप्त हुआ थाI गरीबी, अकाल, भूखमरी जैसी समस्याओं का कारण बढ़ती हुई जनसंख्या और युद्ध को बताया
जा रहा थाI अर्थात् देश की समस्यायों के लिए सरकार या व्यवस्था नहीं बल्कि स्वयं आम लोग
या प्रकृति इसके लिए जिम्मेदार हैंI ‘युद्ध’ या ‘अकाल’ व्यवस्थाजनित
नहीं बल्कि प्रकृति-जनित हैंI सरकार
या व्यवस्था का इसमें कोई दोष नहींI धूमिल
इसी सोच पर प्रहार करते हैंI सत्ता
के सामने प्रश्न खड़ा करते हैंI लेकिन
व्यवस्था का प्रतीक ‘चालाक
आदमी’ कवि के प्रश्न का उत्तर देने की
बजाय –
उसने
गलियों और सड़कों और घरों में
बाढ़ की तरह फैले हुए बच्चों की
ओर इशारा किया
और हँसने लगाI
फिर जल्दी से हाथ छुड़ाकर
‘जनता
के हित में’ स्थानान्तरित
हो गया
व्यवस्था इतनी चालाक है कि वो दोनों तरह की बात कहने में माहिर हैI एक ओर यह व्यवस्था भूख को जन्म
देती हैI ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करती हैं
कि बेकारी बढ़े,जनसंख्या बढ़े क्योंकि इसी में उनका लाभ हैI दूसरी ओर एनजीओ या योजनाओं आदि के माध्यम से एहसान की तरह थोड़ी से
मदद करके व्यवस्था अपने प्रति क्रोध को कम करता है। व्यवस्था हमेशा इन समस्याओं की
मूल वजह को उजागर होने से रोकती हैI ‘हिजेमनी’ इसी तरह कायम रहती है जहाँ जनता
को हमेशा यह लगते रहे कि व्यवस्था जरुर उनके लिए कुछ न कुछ कर रही हैI अर्थात् जनता को यह लगना चाहिए
कि वर्तमान सत्ता उनका कल्याण कर रही हैI वास्तव
में सत्ता को कायम रखने के दो औजार हैं एक ‘सहमति’ से
और दूसरा ‘दमन’ सेI यह
सत्ता को कायम रखने का सबसे सहज रास्ता हैI इस सहजता को अगर कोई तोड़ सकता है तो वह बुद्धिजीवी वर्ग हैI
सत्ता को ऐसे ही बुद्धिजीवियों से खतरा होता हैI इस कविता का कवि ऐसा ही
बुद्धिजीवी है जो व्यवस्था की असलियत को समझ गया है –
और सहसा मैंने पाया कि मैं ख़ुद
अपने सवालों के
सामने खड़ा हूँ और
उस मुहावरे को समझ गया हूँ
जो आज़ादी और गाँधी के नाम पर चल
रहा है
जिससे न भूख मिट रही है, न मौसम
बदल रहा हैI
‘यह आज़ादी झूठी है, देश
की जनता भूखी है’ नारे
की कव्यात्मक व्याख्या का इससे सुन्दर उदाहरण शायद ही किसी वामपंथी कवि के यहाँ
मिलेI कवि व्यवस्था की उस भाषा को समझ
गया है जो ‘राष्ट्रहित’ के आवरण में शोषण के तंत्र को
संचालित कर रहा हैI यहाँ ‘गाँधी’ शब्द का गाँधीवादी आदर्शों का प्रतीक हैI ‘आदर्शों’ और
कोरे ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर चल रही सत्ता की
असलियत कवि तो समझ गया लेकिन वो जनता नहीं समझ रही जो अकाल और भूख से मर रही है –
लोग बिलबिला रहे हैं (पेड़ों को
नंगा करते हुए)
पत्ते और छाल
खा रहे हैं
मर रहे हैं, दान
कर रहे हैI
कवि की चिंता यहीं शुरू होती है कि इन वीभत्स परिस्थितियों के बावजूद
जनता में व्यवस्था परिवर्तन के लिए कोई सुगबुगाहट नहीं हैI लोगों का खून गर्म नहीं होता। और नया ही लोग इसके लिए लड़ते हैं। उन्हें
इसलिए कवि को यह सब कुछ सामान्य लग रहा है –
जलसों-जुलूसों में भीड़ की पूरी
ईमानदारी से
हिस्सा ले रहे हैं और अकाल को
सोहर की तरह गा रहे हैंI
झुलसे हुए चेहरों पर कोई चेतावनी
नहीं हैI’
कवि चाहता है कि लोगों के भीतर व्यवस्था के प्रति विद्रोह का भाव
उत्पन्न हो लेकिन परिस्थितियों ने जनता को ऐसा बना दिया है कि वे भी असली तथ्य के
बारे में सुनना या जानना नहीं चाहतेI अंधे ‘राष्ट्रवाद’ के कारण उन्हें संभवतः सत्ता
विरोध, राष्ट्र विरोध के रूप में दिख
रहा हैI ‘राष्ट्रवाद’ ऐसा हथियार है जिससे कोई भी
व्यवस्था अपने शोषण को सही बताती है और अपने हित को राष्ट्रहित के रूप में प्रस्तुत
करती हैI जिस समय यह कविता लिखी गयी थीI वह दौर भारत-पाकिस्तान युद्ध का समय था और इंदिरा गाँधी ‘दुर्गा’ के रूप में देश बचा रहीं थीI दरअसल जनता अपने ही समस्याओं से ‘अलगाव बोध’ में
थीI कवि उन्हें समझाने की कोशिश करता
है पर वहाँ हर तर्क के ऊपर ‘राष्ट्रवाद’ का तर्क भारी है –
मैंने जब भी उनसे कहा है देश
शासन और राशन
उन्होंने मुझे टोक दिया हैI
अक्सर, वे मुझे अपराध के असली मुकाम पर
अँगुली रखने से मना करते हैंI
जिनका आधे से ज्यादा शरीर
भेड़ियों ने खा लिया है
वे इस जंगल की सराहना करते हैं –
‘भारतवर्ष
नदियों का देश हैI
कवि यहाँ पूरे राष्ट्र को एक जंगल का प्रतीक मानते हुए इसे भेड़ियों
का साम्राज्य कहता हैI उसकी
चिंता यह है कि जो लोग इस जंगलरूपी राष्ट्र में शोषित-पीड़ित हैं, वही इसकी प्रशंसा कर रहे हैंI इसका कारण सत्ता की ‘हिजेमनी’ है जो इन्हें सत्ता की असलियत समझने नहीं देता –
मगर वे हैं कि असलियत नहीं समझतेI
अनाज में छिपे ‘उस आदमी’ की नीयत
नहीं समझते
जो पूरे समुदाय से
अपनी गिज़ा वसूल करता है –
कभी ‘गाय’ से
और कभी ‘हाय’ से
‘गिज़ा’ का अर्थ यहाँ भोजन या खुराक से हैIकवि के लिए यह विडम्बनापूर्ण स्थिति है कि लोग सत्ता की असलियत नहीं
समझ रहे हैं जबकि पूरी सत्ता जनता के शोषण से संचालित हैI यह सत्ता कभी धर्म से तो कभी डर के माध्यम से लोगों का शोषण कर रही
हैI यहाँ ‘गाय’
साम्प्रदायिक विभाजन का प्रतीक हैI ‘हाय’ यहाँ देश के ऊपर खतरे का प्रतीक
हैI अर्थात् व्यवस्था कभी बाहरी तो कभी
भीतरी काल्पनिक खतरों का भय दिखाकर अपने तंत्र को बरकरार रखे हुए हैI कवि जनता को इस प्रजातांत्रिक व्यवस्था की गैर-बराबरी को सरल
शब्दों में समझाने का प्रयास करता है –
वह कौन-सा प्रजातांत्रिक नुस्खा
है
कि जिस उम्र में
मेरी माँ का चेहरा
झुर्रियों की झोली बन गया है
उसी उम्र की मेरे पड़ोस की महिला
के चेहरे पर
मेरी प्रेमिका के चेहरे-सा
लोच है
कवि जीवन के अंतरंग अनुभवों से व्यवस्था की असलियत को रखता हैI यहाँ नारी सौन्दर्य के माध्यम से सत्ता की
कुरूपता को सामने रखा गया हैI परन्तु
सत्ता का तिलिस्म तोड़ना कोई आसान कार्य नहीं हैI वास्तव में जो आलोचक धूमिल की इस बात के लिए आलोचना करते हैं कि
उन्हें जनता पर विश्वास नहीं, वैसे
आलोचक इस बात को भूल जाते हैं कि जनता अपनी समस्याओं से त्रस्त है और क्रांति के
लिए जनता को तैयार करना एक कठिन कार्य हैI धूमिल की कविता खासकर ‘अकाल-दर्शन’ इसी कठिनाई को व्यक्त करती है-
वे चुपचाप सुनते हैंI
उनकी आँखों में विरक्ति है ;
पछतावा है ;
संकोच है
या क्या है कुछ पता नहीं चलताI
वे इस कदर पस्त है :
कि तटस्थ हैंI
जनता में चाहे कितनी ही शक्ति हो पर उसका ‘अलगाव बोध’ उसे
व्यवस्था परिवर्तन से रोकता हैI जनता
इसलिए ‘तटस्थ’ या ‘पस्त’ नहीं है कि वो कुछ कर नहीं सकतीI वास्तव में व्यवस्था के ‘हिजेमनी’ से वो भ्रमित हैI ‘क्या
करें’ यह उसके सामने प्रश्न हैI कोई भी ईमानदार कवि यह कहकर इस
प्रश्न से भाग नहीं सकता कि उसे जनता पर पूर्ण विश्वास है और जनता क्रांति करने जा
रही हैI यह सच्चाई है कि ऐसे तमाम
विश्वासों के बावजूद व्यवस्था में कोई आमूलचूल परिवर्तन नहीं हुआ हैI कुछ बड़े आंदोलनों के बावजूद
व्यवस्था का स्वरुप जस का तस बना है और आखिर ऐसा क्यों है? इस प्रश्न का उत्तर धूमिल की कविताओं की गहराई में जाकर जाना जा सकता
हैI धूमिल ‘अकाल-दर्शन’ की
आखिरी पंक्तियों में सत्ता की ‘हिजेमनी’ और क्रांति के संबंधों की सुन्दर
प्रस्तुति करते हैं –
और मैं सोचने लगता हूँ कि इस देश
में
एकता युद्ध की और दया
अकाल की पूँजी हैI
क्रांति-
यहाँ के असंग लोगों के लिए
किसी अबोध बच्चे के –
हाथों की जूजी हैI
क्रांति
के लिए आम जनता की ‘एकता’ और परस्पर सहानुभूति का भाव
अनिवार्य शर्तें हैंI परन्तु
विडम्बना यह है कि सत्ता द्वारा शुरू किये गए युद्धों के समय ही एकता उत्पन्न होती
हैI अर्थात् ‘राष्ट्रवाद’ या ‘अकाल’ जैसा राष्ट्रीय आपात ही यहाँ एकता और सहानुभूति पैदा करते हैंI भारतीय जनमानसको अपने वास्तविक
शक्ति का पता ही नहींI जिस
प्रकार किसी छोटे बच्चे को दुनिया की समझ नहीं होतीउसी तरह क्रांति की धारणा के
सन्दर्भ में भारतीय जनता अभी कमजोर हैI
धूमिल का उद्देश्य कहीं से भी जनता की ताकत को कम करके आंकना नहीं हैI बल्कि वे इस बात से व्यथित हैं
कि जनता को अपनी शक्ति का बोध क्यों नहीं है ? धूमिल ‘अकाल-दर्शन’ द्वारा सत्ता और जनता की चेतना
के द्वन्द्व से क्रांति के दर्शन की खोज करते हैंI जनमानस पर सत्ता के प्रभुत्व यानि ‘हिजेमनी’ और
स्वयं जनता का अपनी वीभत्स परिस्थितियों से ‘अलगाव’ की
व्याख्या के बिना किसी क्रांति की कल्पना नहीं की जा सकतीI धूमिल का काव्य क्रांति की राह के रोड़ों से टक्कर द्वारा निर्मित है, जिसका ‘अकाल-दर्शन’ प्रतिनिधित्व करता हैI
-
नमक का दरोगा - प्रेमचंद 1.नमक का दरोगा कहानी का सार मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के महानतम कथाकार और उपन्यासकार हैं। उनका जन्म 31 ज...
-
संज्ञा • संज्ञा की परिभाषा – १) “ किसी भी व्यक्ति , वस्तु , जाति , भाव या स्थान के नाम को संज्ञा कहते हैं। ” • ...