Friday, June 7, 2024

Homonymous Word Translation

 Homonymous Word Translation

I do not propose to say anything new here so much as to reexamine briefly some of the fundamental properties that have been recurrently predicated of 'natural languages' and to follow up some of the implications of what this reexamination reveals. The three properties we are going to take up, namely, arbitrariness, necessity, and the duality of patterning (respectively in §§ 1, 2, 3), are logically distinct from each other. It is true that they have frequently been confused with each other in the past, but that is all the more reason for making a special effort to keep them apart in mind.

While considering arbitrariness and necessity, we can very well assume that Saussure's analysis of the linguistic sign into the signifiant and the signifié is adequate and not worry too much about the various refinements, elaborations, reservations, and revisions proposed by later thinkers. With pattern duality, as we shall see, it is another matter.

Having considered the three properties and their interrelations (§ 5).

  1. Arbitrariness. Cross-linguistically, the relation between the signifiant and the signifié is arbitrary. There is no extra-linguistic reason why the given signifiant should not be correlated with other than its usual signifié in a given language, and vice versa. We are quite justified in laughing at the English soldier who criticized the French for calling a cabbage a shoe (Fr. Chou /šu/). A symbolism is non-arbitrary when there is some sort of appropriateness about it - for example, the geometrical similarity between a map and the original landscape, the similarity of responses that make darkness a symbol of ignorance, the stimulus-response relationship that makes bright red more suitable as a symbol of danger than, say, pale blue.

सांस्कृति, संप्रेषण और अनुवाद(Culture, communication and Translation)

 

संस्कृति, संप्रेषण और अनुवाद (Culture, communication and Translation)   

सांस्कृति, संप्रेषण और अनुवाद (Culture, communication and Translation)   

प्रस्तावना : -


संस्कृति और संप्रेषण समाज के महत्व पूर्ण अंग है जिसके बिना कोई भी समाज पूर्ण नहीं हो सकता। संस्कृति समाज की पहचान होती है। " डे फेस्टिवल " की संस्कृति ने भारतीय संस्कृतिक मूल्यों को जड़ से हीला कर रखा दिया । तो दूसरी ओर संप्रेषण साधनों के आविष्कारों ने सजीव संप्रेषक को निर्जीव संप्रेषक में बदल दिया हैं। समाज में संप्रेषकों को भी संस्कृतिक महत्व होता था जिसका अंत हो चूका हैं। मानव का संपूर्ण व्यवहार और आचरन ही उसकी "संस्कृति" है । इन शब्दों में उसकी सभ्यता समाहीत है, लेकिन किसी की असभ्यता भी उसकी "संस्कृति" हो सकती है ।
जैसे हम Teenage Culture, Male Culture, Female culture, working class Culture, Bakers Culture, Culture of City, State, and Culture of Nation के रुप मे देख सकते है।
मानव जाति के संस्कृतिक प्रथाओं एवं मान्यताओं का भाषिक विश्लेषण मानव विज्ञान में अवधारना के रुप मे किया जाता हैं। भाषा का अध्यन बिना उसकी संस्कृति को जाने करना अस्मभव है । संदेशों को संकेतो द्वार व्यक्त करने की प्रक्रिया संप्रेषण है।
संस्कृतिक सम्प्रेषण की स्थिति को उदरीकरण पूर्व एवं उदरीकरण के बाद की परस्थिति इन दो भागों में विभाजित कर देख सकते हैं। प्रमुख रुप से हम विचार कर सकते है, कि उदारीकरण पूर्व समाज में रीति-रिवाज, उत्सव, त्योहार, देव–देवता, उपासनाविधि आदि में कुछ बदलाव दिखाई देता, तो कई बार नई धारणाओं का भी जन्म होता था। उदारीकरण और जागतिकरण के पश्चात रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार, काम आदि में मूल रुप से भेद दिखाई देता है लेकिन नई सांकृतिक संकल्पनाओं का निर्माण नहीं हो पा रहा है। भारत जैसे सांस्कृतिक देश में जहां महिनों में नई संस्कृतिका निर्माण होता वहीं आज पाश्चात्य देशों की संस्कृति से प्रभावित हो रहा है। जिससे केवल समाज को ही नहीं बल्कि पर्यावरण पर भी इसका विपरीत परिणाम हो रहा हैं।

"सम्प्रेषण" के लिए भाषा ही सम्प्रेषण का एक मात्र साधन नहीं है, हम शारिरीक चेष्टाओं, मुख मुद्राओं एवं सहज वाचिक उत्तेजनाओं से भी अपने भावों, विचारों को सम्प्रेषित करते है। लेकिन शारिरीक क्रियओं से होने वाले सम्प्रेषण को सम्प्रेषण की भाषा नहीं कह सकते। सम्प्रेषण के लिए यह आवश्यक है कि उत्तेजना के संचरण के द्वार श्रोता में प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। सूचना का यथार्थ रुप में संवहन ही सम्प्रेषण है। सम्प्रेषण को प्रमुख दो विभागों में देखा जाता हैं।

१. ध्वनि रहित सम्प्रेषण २. ध्वनि सहित सम्प्रेषण ।

इन दो प्रकारों की समस्याएं भी अलग-अलग हो सकती है । ध्वनि सहित संप्रेषण में मुख्य रुप से मनुष्य के वाचिक संप्रेषण को देख सकते है । ध्वनि रहित संप्रेषण में लिखित रुप को, या शारिरीक क्रियाओं को देख सकते हैं।

संस्कृतिक संप्रेषण में अनुवाद(Translation)  के पक्ष : - संस्कृतिक अवधारना को पूर्ण रुप से समझ ने और संप्रेषित करने के लिए निम्न पक्ष अधिक सहायक होंगे।

१. ईश्वर की संक्लपना

२. कला और नृत्य

३. विवाह, मृत्यु संस्कार और प्रसुति पूर्व एंव बाद के संस्कार (Maternity system)

४. संस्कृतिक अर्थ की समानता ( स्थान के संर्दभ में )

५. सांस्कृतिक ध्वनि

६. राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियाँ

७. विचारधारा

८. सांस्कृतिक उत्सव (कार्यक्रम)

९. अनुवाद की संकल्पना

संस्कृतिक संप्रेषण के लिए समाज एवं पाठ की इन गतिविधियों को ध्यान में रखना आवश्यक होगा। स्थान से तात्पर्य यह है कि संस्कृतिक परिवेश की भौगोलिक परस्थिति।

संस्कृति और संप्रेषण के सेतू : - "भाषा" संस्कृतिक संप्रेषण का सर्वाधिक महत्व पूर्ण साधन है जिसके बिना मानव सफल संप्रेषण ना कर पाता था ना कर पाएगा। एक भाषा दूसरी भाषा से कुछ संस्कृतिक शब्द लेती है, तो कुछ संकृतिक शब्द अन्तरराष्ट्रीय होते है, जिनका अनुवाद(Translation) करने आवश्यकता नहीं होती । कहावते, मुहावरे, लोकोक्तियाँ भी संस्कृतिक संप्रेषण के स्त्रोत है। समाज में

संस्कृतिक सम्प्रेषण को साहित्य ने सर्वाधिक सहायता प्रदान की है। आज भी सहित्य ही एक ऎसा माध्यम है जिससे संकृतिक मूल्यों का पूरी निष्ठा के साथ आदान-प्रदान होता हैं। फिल्म, व्यवसाय, नाटक, गीत, धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन, आदि को भी संस्कृतिक सम्प्रेषण के साधनों के रुप में देखा जा सकता हैं। लेकिन इन माध्यमों की एक विशिष्ट सीमा होती है। संप्रेषण साधनों के आविष्कारों के कारण आज संप्रेषण साधन पूर्ण रुप से बदल गए है। जहां मानव ने संप्रेषण के साधन के रुप मे कबूतर, आदमी और जानवरों का उयोग किया तो आज मोबाईल, कंपूटर, इंटरनेट, फोन, दूरदर्शन, रेडियो, एफएम आदि का उपयोग किया जा रहा हैं। यह सबसे महत्व पूर्ण और सोचनिय विषय है कि इन माध्यमों से संप्रेषण अधिक गति से होता है लेकिन सांस्कृतिक संप्रेषण प्रभावि रुप से नहीं होता। जिसके कारण संस्कृतियों का महत्व भी कम होता जा रहा है।

संस्कृतिक अनुवाद(Translation) में संप्रेषण की समस्याएं : संस्कृतिक समस्याऎं सहित्यिक (लिखित)' मौखिक और व्यवहारीक रुप में आने वाली समस्याऎं होती हैं जिनकी समस्याएं संप्रेषण में भी समान रुप से दखी जा सकती है । जैसे - किसी एक भाषा में किस वस्तू, रंग, या स्थान को धार्मिक रुप से महत्व होगा यह नहीं समझ सकते । तो कई बार दूसरी भाषा सिखने वाला व्यक्ति आदर सूचक शब्द, लिंग, वचन में मौखिक रुप से उच्चारण में गलतियां करता है। जिससे संप्रेषन की प्रक्रिया मे समस्याऎं निर्माण होती है। संप्रेषण प्रक्रिया का प्रकार भी संप्रेषण सफल करने में महत्व पूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें अगर दूविधा उत्पन्न हो जाए तो संप्रेषण में समस्या निर्माण हो सकती है। संकृतियों का सामाज पर आधिक तर परिणाम इस लिए होता है कि संकृति मनुष्य में संवेदना, भाव-भावना निर्माण करने का महत्व पूर्ण कार्य करती है। संप्रेषण प्रक्रिया सफल होने के लिए उत्तेजना के संचरण के द्वार श्रोता में प्रतिक्रिया उत्पन्न होना आवश्यक होता है लेकिन एक संकृति का संवहन उसी रुप में होना संभव नहीं हो पाता एसी परस्तिथि में संप्रेषक को दोष दिया जाता है । विश्वमैत्रि और विश्वबंधूत्व की संकल्पना के कारण दूसरी संस्कृति को जानने के लिए उस परिवेश में रहाना लाभदायक होगा या फिर उस संस्कृति की भाषा या साहित्य को पूर्ण रुप से ज्ञात करना होगा । समाज और संस्कृतियों में हो रहा विकास । अन्य संस्कृतियॊं की रीति –रीवाजों को स्विकार्य - अस्विकार्य की स्थिति भी समाज में निर्माण हो सकती है।


संस्कृतिक अनुवाद
(Translation) में संप्रेषण की समस्याऒं का समाधान : -

उदारीकरण और जागतिकाण पूर्व दो संकृतियों में अधिक असमानताएं होती थी जिसके चलते संप्रेषण में काफी समस्याएं उत्पन्न होती थी। उदारीकरण और जागतिकाण के बाद यह दूरी काफी कम हो चूकि है। इस स्थिति की ओर अनुवादक को विशेष ध्यान देना होगा। सांकृतिक शब्दों, मुहावरों, कहावतों को अधिकतर पाद टिप्पणी के द्वारा स्पष्ट किया जाता हैं। लेकिन कुछ विद्बानों का मानना है कि अगर ऎसे शब्दों की जगह ही स्पष्टिकरण दिया जाए तो पाठक को अधिक सहायता हो सकती है। पाद टिप्पणी के कारण पाठक की पठन प्रक्रिया में अवरोध आकर पाठक की पठन प्रक्रिया की लयात्मकता में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

संप्रेषण के परिमाण (size of communication ) के कारण भी समस्याएं निर्माण होती है। आधुनिक युग की ओर देखा जाए तो संप्रेषण के लिए यह अधिक लाभ दायक होगा की पाठक जिस संस्कृति को अधिक समझता हो, अथवा उसके परिवेश को ध्यान मे रखते हुए संदेश को संप्रेषित करें। इस विधि के कारण संप्रेषक को सूचना ( संदेश ) अधिक प्रभावि रुप से संप्रेषित होगा। सूचना का प्रभाव संप्रेषण शैली अधिक निर्भर होता है इस लिए संप्रेषण शैली पर भी अधिक ध्यान होना चाहिए । इसी के साथ संप्रेषण में सहजता उत्पन्न करना, संस्कृतिक एकरुपता निर्माण करना, दो संस्कृतियों की तुलना कर कर असंदिग्धता दूर करना और पाठ का पुन:निरिक्षण करना आदि से संप्रेषण अधिक सफल होगा ।

उपसंहार : - एक संकृति का दूसरी संस्कृति में संप्रेषण होने से न केवल
उस संस्कृति की आलोचना होती है बल्कि उस समाज और संस्कृति का विकास भी होता है। संकृतिक समस्याओं का पूर्ण रुप से समाधान
होना तो कदापी संभव नहीं है। इसे ध्यान में रखते हुए अगर संप्रेषण के अन्य साधनों का अधिक से अधिक विकास किया जाए तो सांकृतिक संप्रेषण अधिक प्रभावि रुप से हो पाएगा। जैसे : - एक साधन "संकेत" है। देशों को संकेतो द्वार व्यक्त करने की प्रक्रिया संप्रेषण है यह संकेत कुछ भी हो
सकते है । खाने के लिए संकेत रुप में हम पाचों उगलियाँ एक साथ मिला कर
हाथ को ओठों तक ले जाते हैं। लगभग
अधिकतर भाषाओं में यही संकेत हैं।
 विश्वमें कई हजार सांकृतिया हैं लेकिन अनुवाद ही एक एसी कड़ी हो जो समय दूरी और भेदभाव को खतम कर एकता
पैदा कर सकता है। भाषांतरकार और अनुवाद के बंध में यह कह सकते हैं कि जो अनुवाद संप्रेषण परक नहीं हो सकता वह अनुवाद संकृति का वाहक कभी नही हो 
सकता।

सांस्कृति, संप्रेषण और अनुवाद(Translation)




सांस्कृति, संप्रेषण और अनुवाद(Translation)

प्रस्तावना : -


संस्कृति और संप्रेषण समाज के महत्व पूर्ण अंग है जिसके बिना कोई भी समाज पूर्ण नहीं हो सकता। संस्कृति समाज की पहचान होती है। " डे फेस्टिवल " की संस्कृति ने भारतीय संस्कृतिक मूल्यों को जड़ से हीला कर रखा दिया । तो दूसरी ओर संप्रेषण साधनों के आविष्कारों ने सजीव संप्रेषक को निर्जीव संप्रेषक में बदल दिया हैं। समाज में संप्रेषकों को भी संस्कृतिक महत्व होता था जिसका अंत हो चूका हैं। मानव का संपूर्ण व्यवहार और आचरन ही उसकी "संस्कृति" है । इन शब्दों में उसकी सभ्यता समाहीत है, लेकिन किसी की असभ्यता भी उसकी "संस्कृति" हो सकती है ।
जैसे हम Teenage Culture, Male Culture, Female culture, working class Culture, Bakers Culture, Culture of City, State, and Culture of Nation के रुप मे देख सकते है।
मानव जाति के संस्कृतिक प्रथाओं एवं मान्यताओं का भाषिक विश्लेषण मानव विज्ञान में अवधारना के रुप मे किया जाता हैं। भाषा का अध्यन बिना उसकी संस्कृति को जाने करना अस्मभव है । संदेशों को संकेतो द्वार व्यक्त करने की प्रक्रिया संप्रेषण है।
संस्कृतिक सम्प्रेषण की स्थिति को उदरीकरण पूर्व एवं उदरीकरण के बाद की परस्थिति इन दो भागों में विभाजित कर देख सकते हैं। प्रमुख रुप से हम विचार कर सकते है, कि उदारीकरण पूर्व समाज में रीति-रिवाज, उत्सव, त्योहार, देव–देवता, उपासनाविधि आदि में कुछ बदलाव दिखाई देता, तो कई बार नई धारणाओं का भी जन्म होता था। उदारीकरण और जागतिकरण के पश्चात रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार, काम आदि में मूल रुप से भेद दिखाई देता है लेकिन नई सांकृतिक संकल्पनाओं का निर्माण नहीं हो पा रहा है। भारत जैसे सांस्कृतिक देश में जहां महिनों में नई संस्कृतिका निर्माण होता वहीं आज पाश्चात्य देशों की संस्कृति से प्रभावित हो रहा है। जिससे केवल समाज को ही नहीं बल्कि पर्यावरण पर भी इसका विपरीत परिणाम हो रहा हैं।

"सम्प्रेषण" के लिए भाषा ही सम्प्रेषण का एक मात्र साधन नहीं है, हम शारिरीक चेष्टाओं, मुख मुद्राओं एवं सहज वाचिक उत्तेजनाओं से भी अपने भावों, विचारों को सम्प्रेषित करते है। लेकिन शारिरीक क्रियओं से होने वाले सम्प्रेषण को सम्प्रेषण की भाषा नहीं कह सकते। सम्प्रेषण के लिए यह आवश्यक है कि उत्तेजना के संचरण के द्वार श्रोता में प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। सूचना का यथार्थ रुप में संवहन ही सम्प्रेषण है। सम्प्रेषण को प्रमुख दो विभागों में देखा जाता हैं।

१. ध्वनि रहित सम्प्रेषण २. ध्वनि सहित सम्प्रेषण ।

इन दो प्रकारों की समस्याएं भी अलग-अलग हो सकती है । ध्वनि सहित संप्रेषण में मुख्य रुप से मनुष्य के वाचिक संप्रेषण को देख सकते है । ध्वनि रहित संप्रेषण में लिखित रुप को, या शारिरीक क्रियाओं को देख सकते हैं।

संस्कृतिक संप्रेषण में अनुवाद के पक्ष : - संस्कृतिक अवधारना को पूर्ण रुप से समझ ने और संप्रेषित करने के लिए निम्न पक्ष अधिक सहायक होंगे।

१. ईश्वर की संक्लपना

२. कला और नृत्य

३. विवाह, मृत्यु संस्कार और प्रसुति पूर्व एंव बाद के संस्कार (Maternity system)

४. संस्कृतिक अर्थ की समानता (स्थान के संर्दभ में )

५. सांस्कृतिक ध्वनि

६. राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियाँ

७. विचारधारा

८. सांस्कृतिक उत्सव (कार्यक्रम)

९. अनुवाद की संकल्पना

संस्कृतिक संप्रेषण के लिए समाज एवं पाठ की इन गतिविधियों को ध्यान में रखना आवश्यक होगा। स्थान से तात्पर्य यह है कि संस्कृतिक परिवेश की भौगोलिक परस्थिति।

संस्कृति और संप्रेषण के सेतू : - "भाषा" संस्कृतिक संप्रेषण का सर्वाधिक महत्व पूर्ण साधन है जिसके बिना मानव सफल संप्रेषण ना कर पाता था ना कर पाएगा। एक भाषा दूसरी भाषा से कुछ संस्कृतिक शब्द लेती है, तो कुछ संकृतिक शब्द अन्तरराष्ट्रीय होते है, जिनका अनुवाद करने आवश्यकता नहीं होती । कहावते, मुहावरे, लोकोक्तियाँ भी संस्कृतिक संप्रेषण के स्त्रोत है। समाज में
संस्कृतिक सम्प्रेषण को साहित्य ने सर्वाधिक सहायता प्रदान की है। आज भी सहित्य ही एक ऎसा माध्यम है जिससे संकृतिक मूल्यों का पूरी निष्ठा के साथ आदान-प्रदान होता हैं। फिल्म, व्यवसाय, नाटक, गीत, धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन, आदि को भी संस्कृतिक सम्प्रेषण के साधनों के रुप में देखा जा सकता हैं । लेकिन इन माध्यमों की एक विशिष्ट सीमा होती है। संप्रेषण साधनों के आविष्कारों के कारण आज संप्रेषण साधन पूर्ण रुप से बदल गए है। जहां मानव ने संप्रेषण के साधन के रुप मे कबूतर, आदमी और जानवरों का उयोग किया तो आज मोबाईल, कंपूटर, इंटरनेट, फोन, दूरदर्शन, रेडियो, एफएम आदि का उपयोग किया जा रहा हैं। यह सबसे महत्व पूर्ण और सोचनिय विषय है कि इन माध्यमों से संप्रेषण अधिक गति से होता है लेकिन सांस्कृतिक संप्रेषण प्रभावि रुप से नहीं होता। जिसके कारण संस्कृतियों का महत्व भी कम होता जा रहा है।

संस्कृतिक अनुवाद(Translation) में संप्रेषण की समस्याएं : - संस्कृतिक समस्याऎं सहित्यिक (लिखित)' मौखिक और व्यवहारीक रुप में आने वाली समस्याऎं होती हैं जिनकी समस्याएं संप्रेषण में भी समान रुप से दखी जा सकती है । जैसे : - किसी एक भाषा में किस वस्तू, रंग, या स्थान को धार्मिक रुप से महत्व होगा यह नहीं समझ सकते । तो कई बार दूसरी भाषा सिखने वाला व्यक्ति आदर सूचक शब्द, लिंग, वचन में मौखिक रुप से उच्चारण में गलतियां करता है। जिससे संप्रेषन की प्रक्रिया मे समस्याऎं निर्माण होती है। संप्रेषण प्रक्रिया का प्रकार भी संप्रेषण सफल करने में महत्व पूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें अगर दूविधा उत्पन्न हो जाए तो संप्रेषण में समस्या निर्माण हो सकती है। संकृतियों का सामाज पर आधिक तर परिणाम इस लिए होता है कि संकृति मनुष्य में संवेदना, भाव-भावना निर्माण करने का महत्व पूर्ण कार्य करती है। संप्रेषण प्रक्रिया सफल होने के लिए उत्तेजना के संचरण के द्वार श्रोता में प्रतिक्रिया उत्पन्न होना आवश्यक होता है लेकिन एक संकृति का संवहन उसी रुप में होना संभव नहीं हो पाता एसी परस्तिथि में संप्रेषक को दोष दिया जाता है । विश्वमैत्रि और विश्वबंधूत्व की संकल्पना के कारण दूसरी संस्कृति को जानने के लिए उस परिवेश में रहाना लाभदायक होगा या फिर उस संस्कृति की भाषा या साहित्य को पूर्ण रुप से ज्ञात करना होगा । समाज और संस्कृतियों में हो रहा विकास । अन्य संस्कृतियॊं की रीति –रीवाजों को स्विकार्य - अस्विकार्य की स्थिति भी समाज में निर्माण हो सकती है।


संस्कृतिक अनुवाद
(Translation) में संप्रेषण की समस्याऒं का समाधान : -

उदारीकरण और जागतिकाण पूर्व दो संकृतियों में अधिक असमानताएं होती थी जिसके चलते संप्रेषण में काफी समस्याएं उत्पन्न होती थी। उदारीकरण और जागतिकाण के बाद यह दूरी काफी कम हो चूकि है। इस स्थिति की ओर अनुवादक को विशेष ध्यान देना होगा। सांकृतिक शब्दों, मुहावरों, कहावतों को अधिकतर पाद टिप्पणी के द्वारा स्पष्ट किया जाता हैं। लेकिन कुछ विद्बानों का मानना है कि अगर ऎसे शब्दों की जगह ही स्पष्टिकरण दिया जाए तो पाठक को अधिक सहायता हो सकती है। पाद टिप्पणी के कारण पाठक की पठन प्रक्रिया में अवरोध आकर पाठक की पठन प्रक्रिया की लयात्मकता में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

संप्रेषण के परिमाण (size of communication ) के कारण भी समस्याएं निर्माण होती है। आधुनिक युग की ओर देखा जाए तो संप्रेषण के लिए यह अधिक लाभ दायक होगा की पाठक जिस संस्कृति को अधिक समझता हो, अथवा उसके परिवेश को ध्यान मे रखते हुए संदेश को संप्रेषित करें। इस विधि के कारण संप्रेषक को सूचना ( संदेश ) अधिक प्रभावि रुप से संप्रेषित होगा। सूचना का प्रभाव संप्रेषण शैली अधिक निर्भर होता है इस लिए संप्रेषण शैली पर भी अधिक ध्यान होना चाहिए । इसी के साथ संप्रेषण में सहजता उत्पन्न करना, संस्कृतिक एकरुपता निर्माण करना, दो संस्कृतियों की तुलना कर कर असंदिग्धता दूर करना और पाठ का पुन:निरिक्षण करना आदि से संप्रेषण अधिक सफल होगा ।

उपसंहार - एक संकृति का दूसरी संस्कृति में संप्रेषण होने से न केवल
उस संस्कृति की आलोचना होती है बल्कि उस समाज और संस्कृति का विकास भी होता है। संकृतिक समस्याओं का पूर्ण रुप से समाधान
होना तो कदापी संभव नहीं है। इसे ध्यान में रखते हुए अगर संप्रेषण के अन्य साधनों का अधिक से अधिक विकास किया जाए तो सांकृतिक संप्रेषण अधिक प्रभावि रुप से हो पाएगा। जैसे : - एक साधन "संकेत" है। देशों को संकेतो द्वार व्यक्त करने की प्रक्रिया संप्रेषण है यह संकेत कुछ भी हो
सकते है । खाने के लिए संकेत रुप में हम पाचों उगलियाँ एक साथ मिला कर
हाथ को ओठों तक ले जाते हैं। लगभग
अधिकतर भाषाओं में यही संकेत हैं।
 विश्वमें कई हजार सांकृतिया हैं लेकिन अनुवाद(Translation) ही एक एसी कड़ी हो जो समय दूरी और भेदभाव को खतम कर एकता

पैदा कर सकता है। भाषांतरकार और अनुवाद के बंध में यह कह सकते हैं कि जो अनुवाद संप्रेषण परक नहीं हो सकता वह अनुवाद संकृति का वाहक कभी नही हो सकता।


LEXICAL AMBIMUITY IN HINDI – MARAHI MACHINE TRANSLATION SYSTEM IN

 

LEXICAL AMBIMUITY IN HINDI – MARAHI MACHINE TRANSLATION SYSTEM IN

हिंदी मराठी मशीनी अनुवाद में शाब्दिक अस्पस्टता ( समान उच्चारण वाले शब्दों के संदर्भ में )

LEXICAL AMBIMUITY IN HINDI – MARAHI MACHINE TRANSLATION SYSTEM IN
(IN THE CONTEXT OF HOMONMYS)
Kamble Prakash Abhimannu JNU N.Delhi – 67


प्रस्तावना : -
आधुनिकिकरण् के युग में भारतीय विद्वान यह कभी नहीं भूल सकते की भारत एक बहूभाषिक देश है । बहुभाषिकता की कमस्या को अनुवाद के मध्यम के दूर किया गया लेकिन आई टी के युग में भाषा का मुकाबला मशीन से है । “मशीनी अनुवाद के क्षेत्र में वर्तमान युग में इआश्विक स्तर पर प्रमुख निम्न समस्याऎं हैं । जिनका निहाकरण अभी नहीं हो पाया है । समान अर्थ वाले शब्द , समान उच्चारण वाले भिन्नार्थक शब्द , वाक्यगत द्विअर्थकता , संदर्भ परक द्विअर्थकता , अस्पष्ट पद , संकेत , कहावते , मुहावरे , विकसित नए शब्द आदि । “Homonym” शब्द ग्रीक के homo + onyms इन शब्दों के पूर्वसर्ग और परसर्ग से homonym शब्द बना है । जिसका हिंदी अर्थ “ समान उच्चारण वाले शब्द ” है । समान उच्चारण वाले शब्दों से छोटे बच्चे , सामन्य पाठक , श्रोता आदि के मन में भी समस्याऎं उत्पन्न होती है । मानव अपनी कुशल बुद्धि , पूर्व संदेशोंकी सहायता , शारिरीक गतिविधियों को देखते हुए संदेशों का अर्थ समजता है । यह प्रक्रिया पूर्ण रुप से मानवी मस्तिष्क पर आधारित है , जिसे कोश , वैश्विक ज्ञान एवं भाषिक ज्ञान की सहायता होती है । इस समस्या का निराकरण करने के लिए मशीन को मशीनी भाषा से अवगत कराया जाता है लेकिन यह भाषिक साधन विकसित नहीं हुए है ।
मशीनी अनुवाद की समस्याऒं से मशीनी अनुवाद में Homonyms ( समान उच्चारण वाले शब्दों की समस्या ) गंभीर रुप से सामने आई । समान उच्चारण वाले शब्दों के निराकरण की समस्या विश्व से कई मशीनी अनुवाद यंत्रों को है । मशीनी अनुवाद में वैश्विक स्तर की समस्या पर हिंदी – मराठी मशीनी अनुवाद में यह पहला अनुसंधान होगा ।
मशीनी अनुवाद में वाक्य एवं शब्द की द्विअर्थकता का समाधान करने की प्रक्रिया Word Sense Disambiguter में होती है । जिसे Grammatical Ambiguity एवं Lexical Disambiguity इन दो भागों में देखा जाता हैं । Lexical Disambiguyter शब्दों की प्रयोजनमूलकता, भाषा वैज्ञानिक रुपों एवं व्याकरणिक कोटियों के अनुसार शब्दों को विभाजित करता है । Lexical Ambiguity में दो प्रकार की द्विअर्थकता होती है Polysemy और Homonym. Homonyms से उत्पन्न द्विअर्थकता अधिक कठिनाइयाँ उत्पन्न करती है । Homonyms को निम्न रुप से विभाजित किया किया जाएगा ।

क्र. वर्तनी उच्चारण अर्थ
१. समान वर्तनी समान उच्चारण भिन्न अर्थ
२. समान वर्तनी ( भिन्न व्याकरण ) भिन्न उच्चारण भिन्न अर्थ
३. भिन्न वर्तनी समान उच्चारण भिन्न अर्थ

(नामों में अधिकतार समान उच्चारण वाले भिन्नर्थक शब्दों को देखा जाता हैं )
जैसे : -
क्र. हिंदी व्याकरणिक कोटि मराठी अर्थ
१. पंकज नाम कमळ जलज, कमल क फूल
२. पंकज नाम पंकज लडके का नाम
३. पर कारक पर , परंतू लेकिन , परंतु
४. पर नाम पंख पक्षी
५. कर नाम कर , हाथ कर , हाथ
६. कर क्रिया करणे करना

हिंदी – मरठी में एसे कई शब्द है जिनके उच्चरण , वर्त्नी और् अर्थ समान है जैसे : - साल – वर्ष , साल – फल का छिल्का या पेड की छाल । स्त्रोत भाषा मे आए किसी श्ब्द की लक्ष्य भाषा में
“ समान उच्चारण , कमान वर्तनी , समान अर्थ हो सकता है “ । “समान उच्चरण वाले शब्दों की समस्या स्त्रोत भाषा एवं लक्श्य भाषा दॊनों भाषाऒं में एक ही शब्द के समान उच्चारण वाले दो अर्थ होते है । इन समस्याओं के काहण अनुवादक गलतियाँ करता हैं । यही समस्या मशीनी अनुवाद करेगी । इस शोध में इस समस्या पर भी विचार किया जाएगा ।

व्याकरणिक एवं भाषा वैज्ञानिक नियम : - मशीनी अनुवाद में व्याकरण महत्वपूर्ण होता है । अंग्रेजी भाषा की वाक्य रचना ( कर्ता – कर्म - क्रिया ) इस प्रकार की है । दोनॊं भाषाऒं की वाक्य रचना भिन्न होने के कारण कई व्याकरणिक समस्याएँ उत्पन्न होती है । हिंदी मराठी एक ही भाषा परिवार से होने से हिंदी – मरठी भाषा की वाक्यसंरचना ( कर्ता – कर्म - क्रिया ) समान है । जिसका उपयोग वाक्य के अर्थ को स्पस्ट करने में होग ।
शोध प्रविधि : - शोध की प्रविधि मात्रात्मक एवं गुणात्मक होगी । जिसमें भाषा की व्याकरणिक कोटियों की समानताओं के कारण व्याकरणिक सूत्र परक ( Rule-based ) मशीनी अनुवाद यंत्र के निर्माण में कार्य करना उचित होगा । मात्रात्मक प्रविधि में व्याकरणिक नियमों एवं भाषा वैज्ञानिक रुपों को नियमबद्ध किया जाएगा । इस अनुसंधान में java programming language क उयोग होगा । अनुसंधान के उपयोग के लिए अनुसंधान को Internet कि शायता से अन्य विश्वविद्यालयों , मशीनी अनुवाद यंत्र निर्माण में कार्य कर रहें संस्थानों एवं अनुसंधान कर्ताओं से भी इस विषय पर विचार किया जा सकें । अनुसंधान के लिए मशीनी अनुवाद के अन्य भाषिक साधनों की सहायता ली जाएगी । १.वाक्य विश्लेशक ( Tagger ) 2.शब्द विश्लेशक ( Chunker ) 3.कार्पस( corpus ) ४.कंम्पूटरी कृत कोश ( Computational Dictionary )
अनुसंधान का प्राथमिक उपयोग : - यह अनुसंधान का निम्न मशीनी अनुवाद यंत्रों में उपयोग होगा । १.शब्दबंध हिंदी मरठी आन ( Shabdabandha Hindi to Marathi Online Dictionary ) २.भारतीय भाषा से भारतीय भाषाओं के अनुवाद के लिए ।
भारतीय भाषाओं में मशीनी अनुवाद को मिली इस गति को सफल करने के लिए यह अनुसंधान अवश्य सहायक होगा । प्रस्तवित शोध का अध्याय विभाजन
प्रस्तावना : -
१.मशीनी अनुवाद की समस्याऎं
१.वैश्विक स्तर पर अनुवाद की समस्याऎं
२.भारत में मशीनी अनुवाद की समस्याऎं
२.समान उच्चारण वाले शब्दों से अनुवाद एवं मशीनी अनुवाद में निर्माण होने वाली समस्याऎं
१. मानव द्वार होने वाले अनुवाद एवं मशीनी अनुवाद समान उच्चारण वाले शब्दों की समस्याऎं
२. समान उच्चारण वाले शब्दों के प्रकार एवं व्यकरणीक सूत्र
३.हिंदी मराठी मशीनी अनुवाद समान उच्चारण वाले शब्दों की समस्याओं का भाषिक सूत्र
१.समान लिपी , समान उच्चारण , भिन्नार्थक शब्द
२. समान लिपी , भिन्न उच्चारण , भिन्नार्थक शब्द
३. भिन्न लिपी , समान उच्चारण , भिन्नार्थक शब्द
४. समान उच्चारण वाले शब्दों की समस्याओं का निराकरण कंपूतरी भाषा के रुप में
१. व्याकरणिक एवं भाषा वैज्ञानिक नियम
२.कंम्पूटर प्रोग्रामिंग भाषा
५. उपयोग
१.भारतीय भाषा से भारतीय भाषा के कंम्पूटरी कृत कोश के लिए
२.भारतीय भाषाओं से भारतीय भाषाओं के मशीनी अनुवाद में
उपसंहार

Abrivation In Machine Translation

 

Abrivation In Machine Translation

1 AT Adequate Translation

2 HAMT Human Aided machine Translation

3 HT Human Translation

4 MAHT Machine Aided Human Translation

5 MT Machine Translation

6 RL Receptor Language

7 SL Source Language

8 SLT Source Language Text

9 TL Target Language

10 TLT Target Language Text

11 A Adjective

12 ALO Allomorph

13 ALPAC Automatic Language Processing Advisory Committee

14 ART Article

15 ATN Augmented Translation

16 CAT Category

17 CEC Commission Of European Communities

18 CETA Centre d Etudes pour la tradition Automatipue

19 CLS Conditional Limitique Semantics

20 COP Copular

21 CPU Central Processing Unit

22 CSIR Common Sense In Ference Rule

23 Det Determiner

24 FS Function Syntactique

25 GB Government and Binding

26 GETA Group d Etudes Pour la Traducation automatique

27 GN Group nominal

28 GOV Governor

29 Indobj Indirect Object

30 INST Instrument

31 IR Inter Mediate ( or Interface ) Representation

32 LDB Lexical Database

33 LDCS Lexical Data Control System.

34 LHS Left hand side

35 LRC Linguistic research Centre

36 LS Limited Semantics

37 LSP Language For Special purposes

38 MAT Machine Aided Translation

39 N Noun

40 NP Noun phrase

41 NBR Number

42 OCR Optical Character Recognition

43 PAT Patient

44 PHVB Phrase Verbal (VP)

45 SP Spell Checking

46 GC Grammar Cheeking

47 CR Character Recognition

48 OCR Optical Character Recognition

49 WK World knowledge

50 GC Grammar Categories

51 CF Contextual Features

52 FAGPMS Fully Automatic General Purpose Machine Translation System

53 DMTS Direct Machine Translation System

54 AI Artificial Intelligence

55 TGG Transformational Generative Grammar

56 CG Case Grammar

56 PG Paninian Grammar

57 MHRD Ministry of Human Resource Development

58 NL Natural Language

59 NLI Natural Language Interface

60 ACL Association of Computational Linguistics

61 FOL First Order Logic

62 TMS Terminology Management System

63 EBMT Example based Machine Translation

64 HTML Hypertext Mark-up Language

65 DBCS Double byte Character Set

67 MI Mutual Information

68 RTF Rich Text Format

69 TM Translation Memory

70 TMX Translation Memory Exchange

71 XML Extensible Mark-up Language

72 MA Morphological Analyser Synthesis

73 MS Morphological Synthesis

74 BD Bilingual Dictionary

75 CT Computational Techniques

76 GTA General Translation Approach

78 LT Linguistic Techniques

79 PSG Phrase Structure Grammar

80 SF Semantic Features

81 ALA Allomorphic Lexical Analysis

82 AE Application Envirment

83 HL High Level

84 LL Low Level

85 MG Morphological Generation

86 ST Structural Transfer

87 TXT Text sentence

89 CS Complex sentence

90 S Sentence

91 VP Verb phrase

92 PREV Preverbal Field

93 VG Verbal phrase

94 POST Post verbal Field

95 CNG Complex Noun group

96 RELC Relative Clause

97 Nog Nominal Group

98 Pg Prepositional Group

99 Fiv Finite Verb form

100 Rel Relative word

101 POS Part of Speech

102 PS Production systemc

103 PS Preference Semantics

104 PW Principal word

105 RHS Right Hand Side

106 RL Relation Logique (Logical Relation)

107 RT Root of Transition Network

108 SING Singular

109 SL Source Language

110 TAUM Traduation Automatioqu De l`Universite de Montr`eal

111 TG Transformational Grammar

112 TG Topical glossary ( in SYSTRAN)

113 TL Target Language

114 TR Transformational Rule

115 TS Transformational System

116 UL 0Unite Lexical ( Lexical Unit )

117 VP Verb Phrase

118 WSD Word sense Disambiguation

119 RA Relational Ambiguity

120 RDBMS Relational Database Management System

121 TD Terminology Databank

123 SA Syntactic analyser

124 SA Sema ntic Analyser

125 CA Contextual Analyser

126 CD Contextual Analyser

127 CD Conceptual Dictionary

128 LFG Lexical Functional Grammar

129 SLD Source Language Dictionary

140 TLD Target Language Dictionary

141 STTMT Statistical machine Translation

142 UCSG Universal Clause Structural Grammar

143 UNL Universal Networking Language

144 TT Target Text


145 ST Source Text

अनुवाद की परिभाषाएं (Definition of Translation)

 

अनुवाद की परिभाषाएं (Translation Definition)

कांबले प्रकाश अभिमन्यू दि – ३१-०३-०८
एम.फिल.हिंदी अनुवाद
जे.एन.यू.
नई दिल्ली -६७

अनुवाद की परिभाषाएं
(Translation Definition)

अनुवाद संबंधी सिद्धांतों पर स्वतंत्र ग्रंथों का लेखन वस्तुत्: बीसवी शताब्दी में प्रारंभ हुवा। इसी शताब्दी के बौरान साहित्यिक और भाषा वैज्ञानिक पत्रिकाओं में अनुवाद पर लेखों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इन्हीं भाषा वैज्ञानिक एवं साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में अनुवाद की कई परिभाषाओं को जन्म दिया। कई परिभाषाओं पर सवाल भी उठाए गए तो कुछ परिभाषाओं को मान्यताएं भी मिली लेकिन आज भी अनुवाद की कोई एक परिभाषा नहीं मिलती है। परिभाषाओं पर विचार किया जाए तो अनुवाद की परिभाषा भाषा वैज्ञानिकों ने भी दी है और साहित्यकारों(कवियों) ने भी दी है।
भारतीय अनुवाद सिधांतकारों ने भी अनुवाद की परिभाषा दी है।
१. Dostert : - Meaning in our view is property of a language. An SL text has an SL meaning, and a TL text has a TL meaning.
डॅअ स्टर्ट : - “हमारे अर्थ विचार में भाषा का गुण है। किसी भी स्त्रोत भाषा के पाठ का अर्थ अपना होता है और लक्ष्य भाषा के पाठ का अर्थ भी अपना होता है।“

2. NIDA : - Translation consists in producing in the receptor language the close natural equivalent to the massage of the source language first in meaning and secondly in style.
नाइडा : - “अनुवाद का संबंध स्त्रोत भाषा के सम्देश का पहले अर्थ और फिर शैली के धरातल पर लक्ष्य भाषा के द्न्कटतम, स्वाभाविक तथा तुल्यार्थक उपादान प्रस्तुत करने से होता है।”

3. J.C.CATFORD : - “The replacement of textual material form one language by equivalent textual material in another language.”
कैटफर्ड : - “अनुवाद एक भाषा के पाठ्परक उपादानों क दूसरी भाषा के रुप में समतुल्यता के सिद्धात के आधार पर प्रतिस्ठापन है।”

4.FORESTEN : - “Translation is the transference of the content of text from one language into another, bearning in maind that we can, always disassociate the content from the forms.
फोर्स्टन : - “एक भाषा में अभिव्यक्त पाठ के भाव की रक्षा करते हुए – जो सदैव संभव नहीं होता – दुसरी भाषा में उतारने का नाम अनुवाद है।“

5.SAMUEL JOHNSON : - To translate is to change into another language retraining the sense.
सॅम्युअल जॅ न्सन : - “अनुवाद मुल भावों की रक्षा करते हुए उसे दूसरी भाषा में बदल देना है।”

6.JOHN CONINGTON : - A translation ought to endeavour not only to say what his author has said, but to say it as he said it.
जॅअन कॅअन्गटन :- “अनुवादक को उसके अनुवा का तो प्रयास करना ही है, किंतु जिस ढंग से कहा है उसके निर्वाह का भी प्रयाक सरना चाहिए।”

7.MATHEW ARNOLD : - A translation shoul affect as in the same way as the original may be supposed to have affected its first hearers.
मैथ्यू अऍर्नाल्ड : - “अनुवाद ऎसा होना चाहिए कि उसका वही प्रभाव पडे जो वूल का उसके पहले श्रोताओं पर पडा होगा। ”

8.WILLIAM KUPAR : - Fidelity indeed is of very essence of translation and the term itself implies it.
विलियम कपूर : - “अनुवाद की निष्ठा ही उसकी आत्मा है और फिर निष्ठा का अर्थ भी तो यही है।”

9.ARL RSKOMAN : - “YOUR AUTHOR ALWAYS WILL BE BEST ADVICE. Fall when he falls and when he rises rise”.
अर्ल रस्कोमन : - “ मूल लेखक का अनुसरण करना सर्वोत्तम है, उकीके शाथ गिरो, उसी के साथ उठो।”

10.ALEKZENDER POPE : - The fire of the poem is what the translator sould principally regarded as it is most likely to expire in his managing.
कविता की मूल चेतना अथवा उपमा की ओर ही अनुवाद का सर्वाधिक ध्यान होना चाहिए, नहीं तो वह अनुवाद के दौरान ही नष्ट हो जाएगी।”

11.ALEKZENDER FREZER TITLAR : -“(1) A translation should give a complete transcript of the ideas of the original work.
(2)the style and manner of writing should be pf the same character as that of the original.
एलेक्जेंडर फ्रेजर टिटलर : - “अनुवाद में मूल का संपूर्ण भाव समाहीत होना चाहिए, अनुवाद की शैली तथा लेखन विधि मूल की जैसी होनी चाहिए।”

12.JULIANE HOUSE : - “Translation is the replacement of a text in the source lanuage by a semantically and pragmatically equivalent text in the trget language…translation oral texts is called interpretation”.
जुलियन हाऊस : - “स्त्रोत भाषा की पाठ्य सामग्री का लक्ष्य भाषाकी अर्थ तठा व्यवहार की दृष्टि से समतुल्य पाथ्यसामग्रि से प्रतिस्थापन है…मौखिक, सामग्री का अनुवाद आशु अनुवाद कहलाता है।”

13.BASU : - “The word ‘Anuvad’ means repetation by way of explanation, illustration or corroboration, that is to say when a speaker demonstrates for some special purpose, a proposition which had already been demonstrated beore, that is called ‘ANUVAD’. ”
( Ashtadhyayi of panini, Vol 1 page 308 )


14.APTE : - (आपटे :- संस्कृत:अंग्रेजी कोशकार) “(1) repetition by way of explanation, illustration corroboration, (2)Explanatory repletion or reference to what is already mentioned, particularly any portion of the Brahmans, which comments on, illustrates or explains a VIDHI or direction previously laid down and which does not itself lay down any direction corroboration”.
१५. Dr.Jonson : - “अनुवाद का आश्य अर्थ को अक्षुण्ण रखते हुए अन्य भाषा में अंतरण करना।”

१६. ए.एच.स्मिथ : - “अनुवाद का तात्पर्य अर्थ को यथासंभव बन्नए रखते हुए अन्य भाषा में अंतरण से है।”

१७.रोमन जैकबसन :- “समस्त प्रकर का अनुवाद कर्य अलोचनात्मक व्याख्या है।”

१८.मेदनिकोवा :- “अनुवाद एक तरह से टीका-टिप्पणी करता है।”

१९ टैंकोक : - “अनुवादक का कार्य द्विमुख होता है – पहले तो उसे मूल के अर्थ का ठीक-ठीक अनुवाद करना होता है और दूक्सरा उसे मूल की शैलीगत विशेषताओं को भी अनुवाद में उतारना है।”

२०.न्यूमार्क : - “अनुवाद एक शिल्प है जिसमें एक भाषा में लिखित संदेश के स्थान पर दूसरी भाषा के उसी संदेश को प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जाता है।”

२१.हार्टमन तथा स्टार्क : - “मक भाषा या भाषाभेद से दूसरी भाषा या भाषाभेद में प्रतिपाद्य को स्ठानंतरित करने की प्रक्रिया करने की प्रक्रिया या उसके परिणाम को अनुवाद कहते हैं।”

२२.हैलिडे : - “अनुवाद एक संबंध है जो दो या दो से अधिक पाठों के बीच होता है, ये पाठ समान स्थिति में समान प्रकार्य सम्पादित करते हैं। दोनों पाठों का संदर्भ समान होता है और उसे व्यंजित होनेवाला संदेश भी समान है।”

२३.सपिर(sapir) : - “मक सभ्यता के एक प्रतिनिधित्व की दृष्टि से दो भाषाएँ समान नहीं हो सकती। कारण दो सभ्याएँ जिन समाजों में जीती हैं उनके अपने-अपने संसार है। इस प्रकार स्पष्ट है की अनुवद में मात्र भाषिक परिवर्तन नहीं होता, प्रत्युत उसमें सभ्यता का रुपांत्रण औएक्षितहै। रुपांत्रण निकटतम ही संभव है।

२४.प्योडोर एच.सेवरी(Savory) : - “अनुवाद प्राय:उतना ही प्राचीन है जितना मेल लेखन और उसका इतिहास ही भ्व्य हौर जटिल है जितना साहित्य की किसी दूसरी शाखा का।”

२५. Dr.गार्गी गुप्त : - “अनुवाद प्रक्रिया के दो मुख्य अंग होते हैं। अर्थबोध और व्याकरण सम्मत भाषा में स्पष्ट संप्रेषण। इसीलिए अनुवाद की निष्ठा दोवुखी होती है, मूल रचनाकर के प्रति अर्थबोध की दृष्टि से और पाठक के प्रति शुद्ध तठा सुबोध संप्रेषण की दृष्टि से। मूल हचना की जो संकल्पनाएँ अथवा स्थितियाँ औदित रचना के पाठक के लिए अज्ञात अस्पष्ट या दुऋह हों, उनकी व्याख्या, स्पष्छीकरण, अंतर्संबंधों का विवरण देना अत्यावश्यक है। यदि हम पाथक की वुल रचना की मनोहारी भूमि में संदेह ले जाना चाहते हैं तो उसका वह मनोहर स्वरुप यथावत उसके मन में भी प्रतिबिम्बित होना चाहिए।”

२६.जी.गोपीनथन : - “अनुवाद वह द्वंद्वात्मक प्रक्रिया है जिसमें स्त्रोत पाथ की अर्थ संरचना(आत्मा) का लक्ष्य पाठ की शैलीगत संरचना ( शरीर ) द्वारा प्रतिस्थापन होता है।”

२७.Dr.कृष्णकुमार गोस्वामी : - “एक भाषा में व्यक्त भावों या विचारों को दूसरी भाषा में समान और सहज रुप से व्यक्त करने का प्रयास अनुवाद है।”

२८.पट्टनायक : - “अनुवाद वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सार्थक अनुभव (अर्थपूर्ण संदेश या संदेश का अर्थ) को एक भाषा-समुदाय से दूसरे भाषा समुदाय में संप्रेषित किया जाता है।”

२९.Dr. सुरेशकुमार :- “एक भाषा के विशिष्ट भाषा भेद के विशिश्ट पाठ को दूसरी भाषा में इस प्रकार प्र्स्तुत करना अनुवाद है जिसमें वह मुल के भाशिक अर्थ, प्र्योग के वैषिश्ट्य से निष्पन्न अर्थ, प्रयुक्ति और शिली की विशिषता, क्विशय वस्तु तथा संबंध सांस्क्रुतिक वैशिश्ट्य को यठासंभव संरक्षित रखते हुए दूसरी भाषा के पाठक को स्वाभ्हाविक रुप से ग्राह्य प्रतित होता है।”

३०.Dr. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव : - “एक भाषा(स्त्रोत भाषा) की पाठ सामग्री में अंतर्निहीत तथ्य का समतुल्यता के सिधांत के आधार पर दूसरी भाषा (लक्ष्य) में संगठनात्मक ऋपंतरण अथवा सर्जनात्मक पुनर्गठन को ही अनुवाद कहा जाता है।”

३१.Dr. भोलानाथ तिवारी : - भाषा ध्वन्यात्मक प्रतीकों की व्यवस्था है और अनुवाद है व्न्हीं प्रतिकों का प्रतिस्थापन, अर्थात एक भाषा के स्थान पर दूसरी भाषा के निकटतम ( कथनत:और कथ्यत:) समतुल्य और सहज प्रतीकों का प्रयोग। इस प्रकार अनुवाद निकटतम, समतुल्य और सहज प्रतिप्रतीकन है।

“हिंदी गद्य साहित्य की नई विधाओं का विकास और हिंदी अनुवाद”

 

“हिंदी गद्य साहित्य की नई विधाओं का विकास और हिंदी अनुवाद”

दि :-24 /०४/०८
kamble prakash abhimannu
Hindi Translation
JNU- N.Delhi

“हिंदी गद्य साहित्य की नई विधाओं का विकास और हिंदी अनुवाद”

प्रस्तावना : -
केवल साहित्य ही नहीं समाज, संस्कृति, साहित्य, भाषा, व्यवसाय एवं अनुवाद से जुडे अधिकतर विधाओं के विकास में अनुवाद का ही योगदान महत्वपूर्ण रहा हैं। आज भी आधुनिकता और प्रौद्योगिकी के युग में भी अनुवाद यह भूमिका बखूबि निभा रहा हैं।
हिंदी में नई साहित्यिक विधाओं के विकास में हिंदी अनुवाद की भूमिका किस प्रकार महत्व पूर्ण रही इसे हम केवल अनुवाद की भूमिका को ध्यान में रखते हुए निम्न रुप से देख सकते है।
पाश्चात्य सहित्य के विकास के साथ ही हिंदी साहित्य की विधाओं का विकास भी होता गया। इसका एक कारण यह था की इस दौरान अधिकतर जगह अनुवाद की स्त्रोत भाषा अंग्रेजी थी। विश्व के किसी भी साहित्य का अनुवाद पहले अंग्रेजी में होता फिर अंग्रेजी के माध्यम से अन्य भाषा जैसे हिंदी अनुवाद होता था। हिंदी साहित्य में न केवल पाश्चात्य साहित्य में विकसित साहित्यिक विधाओं का ही विकास हुवा बल्कि भारतीय भाषाओं के साहित्यक विधाओं का भी विकास अनुवाद के माध्यम से हिंदी की साहित्यिक विधाओं में दिखाई दिया । विशेष कर हम उन्हीं विधाओं पर अधिक विचार करेंगे जिसमें अनुवाद का महत्व अधिक रहा। जिसमें मुख्य रुप से निम्न विधाओं को प्रमुख रुप से दिखा जाता हैं। १.नाटक २.उपन्यास ३.निबंध ४.कहानी ५.संस्मरण ६.आत्मकथा ७.जीवनी ८.समीक्षा ९.इंटरव्यूव साहित्य (साक्षात्कार) १०.यात्रा-साहित्य ११.डायरी-साहित्य १२.रेखाचित्र १३.एकांकी १४.पत्र-साहित्य १५.काव्य आदि। साहित्यिक विधाओं के विकास पर बारिकी से अनुसंधान कीया जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा की हिंदी साहित्य में इन नई साहित्यिक विधाओं के विकास में अनुवाद ने सबसे महत्व पूर्ण भूमिका निभाई हैं। परंतू आज भी अनुवाद को उसके कार्य के अनुसार हिंदी साहित्य में महत्व नहीं दिया जाता फिर भी अनुवाद अपना कार्य निरंतर रुप करता रहेगा।
उपन्यास : -
इसमें कोई संदेह नहीं की उपन्यास हिंदी साहित्य की सबसे अधिक लोकप्रिय विधा है। इसका एक कारण यह भी है कि हिंदी उपन्यास के विकास की प्रक्रिया में न केवल हिंदी के मौलिक ग्रंथो का योगदान रहा बल्कि पाश्चात्य देशों मे लिखे महानतम ग्रंथो के अनुवाद हिंदी उपन्यास के विकास में मिल का पत्थर साबित हुए। जितने मौलिक उपन्यास लिखे जा रहें थे उसी के अनुपात में हिंदी अनुवाद का कार्य भी समान रुप में चल रहा था। न केवल पाश्चात्य बल्कि भारतीय भाषाओं से भी हिंदी में कई उपन्यासों का अनुवाद हो रहा था। बंकिमचंद्र, रवींद्रनाथ, बाबू गोपालदास, रमेश्चंद्रदत्त, हाराण्चंद्र, चंडीचरण सेन, शरद बाबू, चारुचंद, आदि बंग उपन्यासकारों के उपन्यासों का अधिक अनुवाद हुवा।
कुछ उर्दू और संस्कृत उपन्यासों के अनुवाद भी हुए जैसे – ’ठगवृतांतमाल’ ’पुलिसवृतांतमाल’ ’अकबर’ ’चित्तौरचातकी’ ’इला’ ’प्रमीला’ ’जया’ और ’मधुमालती’आदि उपन्यासों का अनुवाद किया।उदाहण स्वरुप हम कुछ उपन्यासों के अनुवाद की छोटी सूची हम निम्न रुप से देख सकते है।
अनु.क्र
मूल lekhak
उपन्यास
अनुवादक
१.
रमेश्चनद्र
बंग विजेता
गदाधरसिंह(१८८६)
२.
बंकिमचन्द्र
दुर्गेशनन्दिनी
गदाधरसिंह(१८८२),राजसिंह,इंदरा रानी, युगलांगुर,प्रतापनारायण मिश्र
३.
दामोदर मुकर्जी
मृण्मयी
राधाचरण गोस्वामी
४.
स्वर्ण कुमारी
दीप निर्वाण
मुंशी हरितनारायण लाल

इतने ही नहीं अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, रशियन, जैसी पाश्चात्य भाषाओं के साथ ही तमिल, तेलगू, मरठी आदि भारतीय भाषाओं से भी अनुवाद प्रस्तूत हुए। जिनका योगदान आज भी महत्वपूर्ण हैं।

नाटक : -
बाबू रामकृष्ण वर्मा द्वारा ’वीरनार’,’कृष्णाकुमा’ और ’पद्मावत’ इन नाटकों का अनुवाद हुवा। बाबू गोपालराम ने ’ववी’, ’वभ्रुवाह’, ’देशदशा’, ’विद्या विनोद’ और रवींद्र बाबू के ’चित्रांगदा’ का अनुवाद किया, रुपनारायण पांण्डे ने गिरिश बाबू के ’पतिव्रता’ क्षीरोदप्रसाद विद्यावियोद के ’खानजहाँ’ दुर्गादास ताराबाई, इन नाटकों के अनुवाद प्रस्तुत किए।
अंग्रेजी नाटकों के अनुवाद भी इसी कालखंड मे निरंतर रुप से चल रहे थे। जिन में ’रोमियो जूलियट’ का ’प्रेमलिला’ नाम से अनुवाद हुवा। ’ऎज यू लाईक इट’ और ’वेनिस का बैक्पारी’, उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी के भाई मथुरा प्रसाद चौधरी ’ए मौकबेथ’ का ’साहसेंद्र साहस’ के नाम के अनुवाद किया। हैमलेट का अनुवाद ’जयंत’ के नाम से निकला जो वास्तव में मराठी अनुवाद से हिंदी मे अनूदित किया गया था।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के कालखंड में नाटकों का अधिक अनुवाद हिंदी में दिखाई देता है। विद्यासुंदर (संस्कृत “चौरपंचाशिका” के बंगला-संस्करण का अनुवाद), रत्नाअवली, धनंजय विजय (कांचन कवि कृत संस्कृत नाटक का), कर्पूरमंजरी (सट्टक, के संचन कवि-कृत नाटक का अनुवाद) अगर हिंदी नाटक में भारतेंदु हरिश्चंद्र के कालखंड में किन अनूदित नाटकों ने महत्व पूर्ण कार्य किया तो उसे हम निम्न रुप से देख सकते है। कुछ नाटकों के अनुवाद दो अनुवादकों ने भी किए है।
“संदर्भ”[1]
अनु.क्र
मूल नाटककार
नाटक
अनुवादक

भवभूति
उत्तररामचरित
देवदत्त तिवारी(१८७१),
नन्दलाल विश्वनाथ दूबे (१८८६)

भवभूति
मालतीमाधव
लाला शालीग्राम(१८८६),लाला सीताराम (१८९५),

भवभूति
महावीरचरीत
लाला सीताराम(१८९८)

कालिदास
अभिज्ञानशाकुन्तल
नन्दलाल विश्वनाथ दूबे (१८८८)

कालिदाक
मालविकाग्निमित्र
लाला सीताराम (१८९८)

कृष्णमित्र
प्रबोधचन्द्रोदय
शीतलाप्रसाद(१८७६), आयोध्याप्रसाद चौदरी १८८५

शुद्रक
मृच्छकटिक
गदाअधर भट्ट(१८८०),लाला सिताराम

भट्ट नारायण
विणीसंहार
ज्वालाप्रसाद सिंह(१८९७)

हर्ष
रत्नावली
देवदत्त तिवारि(१८७२),
१०
माइकेल मदुसूदन
पद्मावती
बालकृष्ण भट्ट(१८७५)
११
माइकेल मदुसूदन
शर्मिष्ठा
रामचरण शुक्ल(१८८०)
१२
माइकेल मदुसूदन
कृष्णमुरारी
रामकृष्ण वर्मा(१८९९)
१३
मनमेहन वसू
सती
उदितनारायण लाल(१८८०)
१४
राजकिशोर दे
पद्मावति
रामकृष्ण वर्मा(१८८६)
१५
द्वारिकानाथ गांगुली
विर नारी
रामकृष्ण वर्मा(१८९९)
१६
शेक्सपियर
मरचेंट ऑफ् वेनिस
“वेनिस का व्यापारी” – आर्या १८८८
१७
शेक्सपियर
द कॉमेडी ऑफ् एरर्स
“भ्रमजालक” – मुशी इमदाद अली, “भूलभुलैया” – लाला सिताराम
१८
शेक्सपियर
ऎज यू लाइक इट
“मनभावन” – पुरोहित गोपीनाथ, १८९६
१९
शेक्सपियर
मैकबेथ
“साहसेंद्र साहस” मथुराप्रसाद उपाध्याय,१८९३
२०
एडीसन
केटो
कृतान्त(१८७६)
संस्कृत नाटकों का हिंदी में अनुवाद होता रहा हैं। संस्कृत नाटकों के अनुवाद में रायबहादुर लाला सीताराम बी.ए. का कार्य अधिक महत्व पूर्ण रहा। नागानंद ने भी, मृच्छकटिक, महावईरचरित, उत्त्ररामचरित, मालतीमाधव, मालविकाग्निमित्र आदि नाटकों का अनुवाद सफल रुप से किया। यह नाटक अनुवाद होकर भी इन नाटकों की भाषा सरल और सादी और आडंबर शून्य हैं। पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र ने वेणीसंहार और अभिज्ञान शकुंतला के हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किए। सत्य नारायण कविरत्न ने भहूति के उत्तर राअमचरित का अनुवाद किया और मालति माधव का अनुवाद भी किया। इस प्रकार अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत बंगाला अदि भाषाओं से हिंदी मे भारि मात्रा में अनुवाद किया। जिसने हिंदी नाटक साहित्य के विकास में महत्व पूर्ण भूमिका निभाई। आज भी भारी मात्रा में मराठी, गुजराती, पारसी आदि अन्य भारतीय भाषाओं से हिंदी में नाटकों का अनुवाद हो रहा हैं।
मौलिक हिंदी नाटक और अनूदित हिंदी नाटकों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो हिंदी नाटकों के अनुवाद की भूमिका अधिक सशक्त रुप से सामने आ सकती है। जिसमें शेक्सपियर के नाटकों के अनुवाद को अधिक सफलता मिली। हिंदी नाटकों के तकनिक के विकास में शेक्सपियर के नाटकों के अनुवाद का अधिक उपयोग हुवा। साहित्यिक अनुवादों में हिंदी में अधिकतर नाटकों का अनुवाद हुवा है।
२. निबंध : -
निबंध यह विधा हिंदी साहित्य में पूर्ण रुप से स्वर्जित सम्पत्ति है। यह सर्वता खड़ी बोली गद्य कि देन है साथ ही इसकी प्रेरणा पश्चिमी है। हिंदी गद्य का यह आधुनिक रुप है। फ्रांस के “मिकेल मौंटेन” को निबंध साहित्य के जन्मदाता माने जाते है। हिंदी गद्य साहित्य के विकास के समय अंग्रेजी में भी निबंध विधा अधिक विकसित नहीं हुई थी इस कारण इस विधा का विकास हिंदी में मौलिक रुप में ही अधिक गति से हुआ।
निबंध लेखन के प्रारंभिक काल में ही निबंध को रास्ता दिखलाने वाले दो प्रमुख ग्रंथ हिंदी में अनुवाद होकर प्रकाशित हुए।
१. बेकन विचार रचनावली (अंग्रेजी के पहले निबंधकार) के
अंग्रेजी निबंधोंका अनुवाद।
२. विष्णूशास्त्री चिपलूणकर द्वारा लिखित “निबंधमालादर्श” मरठी से हिंदी में अनुवाद किया गया।
यह दोनो भी ग्रंथ अपनी भाषा के महत्व पूर्ण ग्रंथ हैं। यह दोनों ग्रंथ हिंदी निबंध के विकास में महत्व पूर्ण रहें। इसके बाद कई हिंदी साहित्यकारों ने पत्र-पत्रिकाओं में मौलिक निबंध लिखना आरंभ किया। लेकिन आज भी कई भाषाओं से हिंदी में निबंधों का अनुवाद किया जाता हैं।
३. यात्रा साहित्य : -
मनुष्य हमेशा से ही घुम्मकड प्रवृत्ति का रहा है। लेकिन केवल एक जगह से दूसरी जगह धुमने से यात्रा साहित्य नहीं लिखा जाता। कुछ यात्रा प्रेमी या घुम्मकड अपनी –अपनी मनोवृत्ती में साहित्यिक भी होते हैं। जो निसंग भाव से भ्रमण भी करते है और निसर्ग, भिन्न-भिन्न सम्स्कृतियों, समाज, धर्म, आदि से प्रेरणा लेकर साहित्य काभी निर्माण भी करते हैं। जिसमें फाहियान, हेंगसीग, इत्संग, इब्नबतूता, अल्बरुनी, मार्को पोलो, हैवर्नियर आदि को प्रमूख रुप से देख सकते हैं।
इन पाश्चात्य यात्रा वृतांतो का भारी मात्रा में हिंदी में अनुवाद हुवा। जिससे हिंदी में यात्रा साहित्य के विकास में योगदान दिया।
४. डायरी साहित्य : -
डायरी साहित्य विधा हिंदि को पाश्चात्य देशों की देन हैं जिसे भारतीय लेखकोंने अपनी-अपनी शैली में ढाल कर अपनाया है। “महात्मा गांधी के प्रभाव से भारत में डायरी लेखन का प्रवर्तन जीवन साधन के माध्यम के रुप में हुआ।”[2] महात्मा गांधी की डायरी का हिंदी अनुवाद श्रीराम नारायण चौधरी द्बारा अनूदित होकर हिंदी साहित्य में आया। जिसके बाद इस डायरी का अनुवाद अन्य भारतीय और पाश्चात्य भाषाओं में भी होता रहा। इससे कुछ पहले टॉलस्टाय की डायरी का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुवा था। जिससे प्रेरणा लेकर अनेक हिंदी लेखकों का झुकाव कलात्मक डायरी लेखन की ओर हुआ। इसके उपरांत “महादेव भाई की डायरी” का मूल गुजराती से हिंदी में अनुवाद हुवा है। इसी प्रकार की एक डायरी “मनुबहन गांधी” नामक डायरी गुजरती से हिंदी में प्रकाशित हुई।
डायरी लेखन की शैली में विशिष्टता लाने का कार्य भी अनुवाद ने ही किया जिसमें विषय वस्तू के गंभीर विश्लेषण और विस्तार की दृष्टि से “भारत विभाजन की कहानी” महत्वपूर्ण डायरी है। जो मूल रुप में अंग्रेजी ‘maim lik gav ahi’ अहि हिंदी में यह १९४७ में ’एलेन केंपबेल जॉनसन’ ने लिखी है जो लॉर्ड माउंटबेटन के प्रेस अटैची थे।
देखा जाए तो अनुवादने हिंदी साहित्य में डायरी लेखन विधा को हिंदी साहित्य में एक साहित्यिक विधा के रुप में प्रतिस्थापित करने में महत्व पूर्ण भूमिका निभाई है।

५. इंटरव्यू साहित्य (साक्षात्कार) : -
एक साहितिक विधा के रुप में रेखाचित्र और रिर्पोताज की तरह हिंदी को यह साहित्यिक विधा पश्चिम की ही देन है। हिंदी में इस विधा के विकास का श्रेय ’श्री चंद्रभान’ को जाता है, लेकिन हिंदी में इस विधा का सूत्रपात ’पं.बनारसीदास चर्तुवेदी’ को जाता है। “आज विविध क्षेत्रों की पत्र-पत्रिकाओं में और स्वतंत्र पुस्तकों द्वारा हिंदी में इंटरव्यूव साहित्य से परिचित हो चुका है और अनुदित हो रहा हैं।”[3] हिंदी में इसी विधा को साक्षात्कार ’भेंट’ ’भेटवार्ता’ के रुप में देखा जाता है। हिंदी में साक्षात्कार केवल साहित्य में ही अनुवाद नहीं हो रहें बल्कि टि.व्ही चैनलों पर भी व्हिडिओ रुप में भी मोटे रुप में अंग्रेजी और अन्य भाषाओं अनुवाद हो रहें है।
[1] हिंदी साहित्य का इतिहास पृश्ठ - ४८२
[2] हिंदी साहित्य का बृहत इतिहास हरवंशलाल शर्मा पृष्ठ संख्या - ४८६
[3] हिंदी साहित्य का बृहत इतिहास हरवंशलाल शर्मा पृष्ठ संख्या - ४८६
३. हिंदी साहित्य का बृहत इतिहास हरवंशलाल शर्मा पृष्ठ संख्या - ३०९
६. एकांकी : -
यह कहना भ्रामक होगा की भारतीय साहित्य में एकांकी नहीं थी। “जैसे हम देखते है उत्तर भारत की रामलीला, बंगाल की यात्रा, ब्रजभूमी की रासलीला, महराष्ट्र की ललित कला, गुजरात का बवाई, राजस्थान का कठपुतली और नौटंकी के रुपों को देखा जा सकता हैं।”[1] संस्कृत में तो एकांकि के छह रुप दिखाई देते हैं। लेकिन प्रमुख रुप से हिंदी में एकंकी का अधिक विकास भारतेंदु युग में हुआ। जिसने राष्ट्रीय एकता की धारा, पुराणिक धारा, हास्य, व्यंगप्रधान धारा निर्माण हुई।
इसी धारा में हिंदी के मौलिक रचनाकारों ने भी एकांकीयों का अनुवाद किया जिसमें प्रेमचंदजी का नाम भी आता है। हिंदी एकांकी के विकास काल में जी.पी श्रीवास्तव ने ’मौलियर’ के कई एकांकीयों के कई सफल अनुवाद किये। श्रीक्षेमानंद राहत ने टॉल्सटाय के कुछ छोटे एकांकीयों का अनुवाद किया। जिसमें “कलवार् की करतूत” मुख्य है। श्री रुपनारायण पांण्डेय ने रविबाबू के एकंकियों का अनुवाद अधिक किया। द्विवेदी युग में एकांकी के तकनीक में अधिक विकास हुवा जिसका एक कारण अंग्रेजी से अधिक अनुवाद होने लगे थे। इन अनुवादों का प्रभाव हिंदी के मौलिक एकांकीयों के तकनीक में अधिक विकास करने के लिए हुवा। “सृष्टी का आरंभ” जार्ज बर्नाड शा का अनुवाद है। एकंकी का विकास भारतेंदू युग के साथ ही द्विवेदी युग में भी हुआ जिसमें अनुवादकों का अधिक योगदान रहा। द्विवेदी युग के प्रमुख रचनाकारों में जी.पी श्रीवास्तव का नाम पहले आता है। जिन्होंने अधिकतर एकांकीयों का अनुवाद किया हैं। हिंदी एकांकी के विकास में १९३० का वर्ष महत्व पूर्ण रहा। इस वर्ष में कई अंग्रेजी एकांकीयों का हिंदी में अनुवाद हुआ। जिससे अंग्रेजी एकांकी ने हिंदी एकांकी को अनुवाद के माध्यम से अपने रंग में ढाला।

२. पत्र साहित्य : -
पत्र-साहित्य में पाश्चात्य साहित्य में अधिकतर विद्वानों ने लिखे पत्रों को संकलन कर उन्हें प्रकाशित किया जाता था। हिंदी में भी यह प्रथा चली कई विद्वानों के पत्रों के संकलन प्रकाशित हुए। हिंदी में इस विधा के विकास में पं.जवाहरलाल नेहरु के पत्रों का प्रसिद्ध संकलन “पिता के पत्र पुत्रि के नाम” १९३१ में प्रकाशित हुआ। यह पत्र मुख्य रुप से अंग्रेजी में इंदिरा गांधी को लिखे गये थे। जिसका अनुवाद मुंशी प्रेमचंद ने किया। यह अनुवाद हिंदी पत्र साहित्य में सर्वाधिक लोकप्रिय हुवा। और इसी के प्रेरणा से लोगों में विविध विषयों के पत्रों को प्रकाशित करने का उत्साह जगा। उनके “ए बंच आफ ओल्ड लेटर्स” भी अनुवाद १९६० में “कुछ पुरानि चिठ्ठियां” नाम से अनुदित हुआ। नाम से अनुदित हुआ।
पत्र लेखन एक सशक्त और सृजनशिल कला है। जिसका प्रभाव व्यक्ति के चरित्र पर गंभीर रुप से दिखाई देता है। कई महापुरुषों ने कई व्यक्तियों की जीवन धारा बदल दी हैं। जैसे : - लोकमान्य तिलक, शरदचंद्र, रविंद्रनाथ, अरविंद, सुभाषचंद्र बोस, टॉलस्टाय, रोम्यां रोलाँ, न्सन, मार्क्स, शैली, किट्स, आदि के पत्र आज भी प्रभावित करते हैं। महापुरुषों की इस शैली को बरकरार रखने के लिए कई विद्वानों एवं महापुषों के पत्रों का अनुवाद निरंतर रुप से किया गया।

३. कहानी : -
हिंदी साहित्य में कहानी लेखन की परंपरा काफी पूरानी रही है। लेकिन हिंदी साहित्य में कहानी लेखन के विकास में हिंदी अनुवाद की भूमिका महत्वपूर्ण है। “संवत १६६० के लगभग किसी लेखक ने ब्रजभाषा गद्य में “नासिकोपाख्यान” गंथ में संकृत-साहित्य में उपल्ब्ध काहनियों का अनुवाद किया।”[2] दंवत १७६७ में सूरत मिश्र ने संस्कृत के वेताल “पंचविश्तिका” की कहानीयों का अनुवाद ब्रजभाषा गद्य में “वेताल पच्चीसी” के नाम से किया था। इसके बाद लल्लु लाल, सदल मिश्र, और इंशाअल्ला खां के कहानी ग्रंथ हिंदी में माने जाने चाहिए। “किशोरिलाल गोस्वामी की पहली कहानी “इंन्दूमती” भी छायानुवाद की देन है।”[3] इसके बाद भी पत्र-पत्रिकाओं में भी कई अनुवाद नियमित रुप से प्रकाशित होते रहे हैं। आज की पत्र-पत्रिकाओं में सिधे पाश्चात्य भाषाओं से कहानीयों का हिंदी अनुवाद हो रहा हैं।
४. आत्मकथा : -
किसी भी नवजागृत देश और साहित्य की प्रेरणा के मूल स्रोत कुछ महापुरुष होते है। राष्ट्रीयता की एकता के लिए उनके उपदेश और संदेश प्रेरणादायी होते है जिनका उल्लेख और संदेश प्रेरणादायी होता है जिनका कार्यों का उल्लेख उनकी आत्मकथाओं में होता है। केवल अपने राष्ट्र के ही नहीं अन्य देशों के महापुरुषों की आत्मकथा भी प्रेरणादायी होती है। हिंदी साहित्य में आत्मकथाऎं काफी देर बाद लिखी गई। राजेंद्र बाबू की आत्मक्था को छोड कर अन्य अधिकतर आत्मकथाएँ हिंदी अनुवाद के माध्यम से सुलभ है। माहत्मा गांधी की आत्मकथा गुजरती में लिखी है। इसका हिंदी अनुवाद हरिभाऊ उपाध्याय ने १९२७ में किया। जवाहरलाल नेहरु की आत्मकथा “मेरी कहानी” अंग्रेजी में लिखी है। जिसका हिंदी अनुवाद हरिभाऊ उपाध्याय ने किया है। सुभाष चंद्र बोस की आत्मकथा का हिंदी अनुवाद “तरुण के स्वप्न” का हिंदी अनुवाद श्रीगिरीशचंद्र जोशी ने किया। डॉ.सर्वपल्ली रधाकृष्णण की आत्मकथा “सत्य की खोज” के अनुवादक श्री शालिग्राम (१९४८) ने किया है। अनुवाद ने ही कई भाषाओं में “आत्मकथा” इस साहित्यिक विधा को जन्म दिया है। एक तरह से देखा जाए तो अनुवाद ने ही “आत्मकथा” इस साहित्यिक विधा को केवल हिंदी में ही नहीं बल्कि दुनया की अधिकतर भाषाओं में प्रतिष्ठापित करने का काम किया हैं। यह कृतियाँ जैसे महान हैं वैसे ही इनके अनुवाद भी महान हुए है।
भारत ही नहीं विश्व के महापुरुषों ने अपनी आत्मकथा अपनी भाषा में लिखी जिसका अनुवाद करना ही सभी भाषाओं के पाठकों की माँग बढती गई। आज भी दूसरी भाषाओं से उपन्यासों के बाद अधिकतर आत्मकथाओं का ही अनुवाद होता हैं। मराठी में लिखी गई दलित साहित्य में अधिकतर आत्मकथाओं का हिंदी में अनुवाद हो चूका हैं। जिसमें दया पवार, शरण कुमार लिंबाले, नामदेव ढसाल आदि प्रमुख आत्मकथा लेखकों का अनुवाद हो चुका हैं। इसके उपरांत अन्य भारतीय भाषाओं में लिखे दलित साहित्य की आत्मकथाओं का अनुवाद भी नियमित रुप से हो रहा हैं।

जीवनी, रेखाचित्र, अलोचना, और साथ ही कविता, गजल,नई कविता आदिका के विकास मे भी अनुवाद की महत्व पूर्ण भूमिका रही है।


[2] हिंदी कहानी का सफर – रमेषचन्द्र शर्मा पृष्ठ संख्या - ४०३
[3] हिंदी कहानी का सफर – रमेश् चंद्र शर्मा पृष्ठ संख्या - ४०९

मशीनी अनुवादा में कार्य कर रहें प्रमुख संस्थान

 

मशीनी अनुवादा में कार्य कर रहें प्रमुख संस्थान

Anglabharati (IIT-K and C-DAC, N) Eng-IL (Hindi) General (Health) Transfer/Rules
(Pseudointerlingua) Post-edit
1 Anusaaraka (IIT-K and University of Hyderabad) IL-IL (5IL->Hindi) [5IL: Bengali, Kannada, Marathi, Punjabi, and Telugu] General (Children) LWG mapping/PG Post-edit
2 MaTra (C-DAC, M) Eng-IL (Hindi) General (News) Transfer/Frames Pre-edit 3 Mantra
(C-DAC, B) Eng-IL (Hindi) Government Notifications Transfer/XTAG Post-edit
4 UCSG MAT (University of Hyderabad) Eng-IL (Kannada) Government circulars
Transfer/UCSG Post-edit
5 UNL MT (IIT-B) Eng, Hindi, Marathi General Interlingua/UNL Post-edit
6 Tamil Anusaaraka (AU-KBC, C) IL-IL (Tamil-Hindi) General (Children) LWG mapping/PG
Post-edit
7 MAT (Jadavpur University) Eng-IL (Hindi) News Sentences Transfer/Rules Post-edit
8Anuvaadak (Super Infosoft) Eng-IL (Hindi) General [Not Available] Post-edit
9 StatMT (IBM) Eng-IL General Statistical Post-edit
10ASR, M Academy of Sanskrit Research, Melkote
AU-KBC, C Anna University s K. B. Chandrasekhar Research Centre, Chennai
C-DAC, B Centre for Development of Advanced Computing, Bangalore
C-DAC, M Centre for Development of Advanced Computing, Mumbai
(Erstwhile NCST)
C-DAC, N Centre for Development of Advanced Computing, Noida
(Erstwhile Electronics, Research and Development Centre of India)
C-DAC, MH Centre for Development of Advanced Computing, Mohali
(Erstwhile CEDTI)
C-DAC, T Centre for Development of Advanced Computing, Thiruvananthapuram
(Erstwhile Electronics, Research and Development Centre of India)
5
CEERI, D Central Electronics Engineering Research Institute, Delhi
CIIL, M Central Institute for Indian Languages, Mysore
IBM International Business Machines, U.S.A.
IIT-B Indian Institute of Technology, Mumbai
IIT-K Indian Institute of Technology, Kanpur
ISI-K Indian Statistical Institute, Kolkata
JNU, ND Jawahar Lal Nehru University, New Delhi
LTRC, IIIT, H Language Technologies Research Center, IIIT, Hyderabad
TDIL Technology Development for Indian Languages

अनुवाद संबंधित पुस्तकों की सूची

 

अनुवाद संबंधित पुस्तकों की सूची


अनुवाद संबंधित पुस्तकों की सूची


Prakash Kamble
JNU – Hindi Translation
हिंदी अनुवाद के लिए कई हिंदी के विद्वानों ने हिंदी अनुवाद के सिद्धांत पर एवं साहित्यिक अनुवाद पर कई किताबों को प्रकाशित किया है। जिसका उपयोग शैक्षणिक स्तर पर तो किया जाता ही हैं साथ ही कार्यालयों के लिए भी यह किताबें अत्यंत उपयोगी सिध्द हो रहीं है। जहाँ तक हिदी में मशीनी अनुवाद के किताबों की बात हैं। इनकी संख्या काफी कम है या कहा जाए तो नहीं के बराबर हैं। मशीनी अनुवाद में कार्य कर रहें भारतीय विद्वान भी अपनी किताब अधिकतर अंग्रेजी में ही लिखते हैं। इसका एक कारण किताब की यूनिर्व्हसलता कों कायम रखने के लिए ही अधिकतर विद्वान अंग्रेजी में अपनी किताब प्रकाशित करते हैं। लेकिन कुछ किताबों को हम हिंदी में देखते हैं। जिसकों हम निम्न रुप से हम देख सकते हैं।
१. अंग्रेजि – हिंदी अनुवाद व्याकरण
- सूरजभान सिंह
२. कंप्यूटर अनुवाद (भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी और अनुवाद)
- भारतीय अनुवाद परिषद की अनुवाद पत्रिका
मशीनी अनुवाद विशेषांक
३.Natural language processing
- Akshar bharati
१. अनुवाद कला सिध्दांत और प्रयोग
- कैलाश चंद्र भाटिया
२. अनुवाद सिध्दांत की रुपरेखा
- सूरेश कुमार
३. संस्कृत अनुवाद व्याकरण
- शिवाधार सिंह
४. अनुवाद शिल्प समकालिन संदर्भ
- कुसुम अग्रवाल
५. अनुवाद शतक विशेषांक ( भाग - १ )
६. अनुवाद शतक विशेषांक ( भाग - २ )
७. अनुवाद भाषाएं समस्याएं
- डॉ.विश्वनाथ अय्यर
८. राजभाषा हिंदी और अनुवाद
९. प्रयोजन मूलक हिंदी और अनुवाद
१०. मशीनी अनुवाद
- वृषभ प्रसाद जैन
११. अनुवाद सिध्दांत
- डॉ.भोलानाथ तिवारी
१.Computer Aided Translation Technology
- Lynne Bowker
२.Translation and Understanding
- Shilendra Kumar shing
कुछ अनुवाद संबंधित पत्र-पत्रिकाएं
१. अनुवाद शतक
- भारतीय अनुवाद परिषद
२. Translationtoday
३. अनुवाद
४. भाषा
५. Biblio
६. Internation Translation

अनुवाद की राजनीति (Politics of Translation)

 

अनुवाद की राजनीति ( Politics of Translation )

Prakash kamble
JNU Hindi Translation

अनुवाद की राजनीति
(Politics of Translation)


किसी विद्वान् का मानना है कि “मानव जन्मत: राजनीतिक प्राणी है।“ यह राजनीति कभी खुले रुप में दिखाई देती है तो कभी गुप्त रुप में। कभी हिंसक रुप में तो कभी अहिंसक रुप में। कभी मौखिक तो कभी लिखित रुप से। व्यक्ति स्वंम के फायदे के लिए राजनीति करता है, तो कभी उसे मजबूरी में राजनीति का सहारा लेना पडता है। कई विद्वान इसे एक ही सिक्के के दो पहलू के रुप में देखते हैं। जिससे किसी को फायदा होता है तो किसी को नुकसान आज समाज का काफी छोटा अंश राजनीति के घेरे से छूटा हुआ दिखाई देता है। व्यवसाय, शिक्षण, साहित्य, समाज व्यवस्था जैसे समाज के विश्वस्त क्षेत्रों में भी राजनीति का असर जैसे ही बढा राजनीति के जडों ने अनुवाद के क्षेत्र को भी अपने घेरे में ले लिया। जिसमें अनुवाद का निर्माण कर्ता “अनुवादक” सबसे पहले अनुवाद के राजनीति का शिकार हुआ।
अनुवाद कोई सजीव या निर्जीव प्राणी नहीं हैं। अनुवाद एक प्रक्रिया है। जिसका उपयोग एक व्यक्ति एक भाषा में व्यक्त विचारों को दूसरी भाषा में ले जाता है। इस प्रक्रिया में अनुवादक जान बूजकर पूर्ण ज्ञान के बावजूद अनुवाद को मूल अर्थ से दूर ले जाता है}। इस कूटनीतिक प्रक्रिय को अनुवाद की राजनीति(Politics In Translation) कह सकते है। अनुवाद में यह क्रिया अनुवादक स्वंय करता है, या गलती से हो जती है। तो कई बार सामाजिक दबाव के कारण भी अनुवादक लक्ष्य पाठ के साथ खिलवाड करता है। साथ ही अन्य भाषिक पाठकों में मूल रचना के संदर्भ में भ्रांती निर्माण हो सकती है। अनुवाद की राजनीति का एक मूल उद्देश्य यह भी होता है कि अनुवाद के पाठकों में मूल रचना मे प्रति द्वेष निर्माण करना या अनुवाद करते समय निम्न क्षेत्रों में हेर-फेर करने की सम्भावना होती है।
१.भाषाशैली : - देशज, विदेशी, विशिष्ट जाति, स्थान के अनुसार भी भाषा की शैली बदलती हुई दिखाई देती है। अनुवादक जिस भाषा शैली को वरियता देगा उकी भाषा शैली वाले लोग अनुवाद से जुडेंगे। अनुवादक उन्हीं लोगों को जोडेगा जिसे वह जोडना चाहता है। या उसे कहा गया हो की किस शैली को अधिक वरियता देना है। जैसे :- पहले प्रेमचंद के कहानीयों का अनुवाद ठेठ या देहाती मराठी भाषा शैली में न करके साहित्यिक, शिक्षित समाज व्यवस्था की भाषा शैली में किया गया है।
२. मूल पाठ के कूख्य अंशोम् को छोडना : - या मूख्य अंशो का गलत अनुवाद करना। जैसे – दलित साहित्य के अनुवादों में कई अपशब्दों या गालियों को और वासनाधिन वर्णनों को हिंदी अनुवाद में कई जगह छोडा गया हैं। या उन्हें काट दिया गया हैं।
३.शब्द चयन : - शब्द एक खेल के साधन रुप वहीं व्यक्ति ले सकता है जिसके पास शब्दों का भंडार हो। जिसे प्रत्येक शब्द के अर्थ की संपूर्ण जानकारी हो। अनुवाद यह काम बखूबी कर सकता है। क्योंकि उसका काम शब्दों पर ही टिका हुआ है। उसे प्रत्येक शब्द का अर्थ जानना ही होता है। और यहीं से अनुवाद में शब्द चयन के राजनीति की प्रक्रिया भी शूरु होती है। किस शब्द के लिए अनुवाद करते समय दूसरे अर्थ वाल शब्द देना है या दो तीन शब्दों की जगह कहावत या लोकोक्ति का उपयोग करना है।
४. मूहावरे, कहावते, लोकोक्तियों का अर्थ बदल देना: - किसी भी मूहावरे, कहावतें, लोकोक्तियों के दो अर्थ होते है। एक तो सरल अर्थ होता हैं और दूसरा व्यंग्यार्थ या अस्पष्ट अर्थ जिसके शब्दों से अर्थ बदल क भिन्नार्थ निकलता है। अनुवाद को यह तय करना होता है कि दोनों में से किस अर्थ को लेना हैं अगर अनुवाद लेखक को जिस बात को कहना है उसी के आधार पर चलना हो तो वह ज्ञात अर्थ सही रुप में दे देता है अगर वह गलत अर्थ देता हैं तो वह अनुवाद की राजनीति(Politics In Translation) कर रहा है।
५. सांस्कृतिक क्षेत्रों में भिन्नता निर्माण करना - अनुवाद की राजनीति का सबसे प्रमुख अस्त्र सांस्कृतिक क्षेत्रों मे भिन्नता निर्माण करना यह मान सकते है। जिसमें मूल पाठ और अनूदित पाठ की संस्कृतिक में भिन्नता दिखाई जाती है। जिससे मूल पाठ और अनूदित पाठ के पाठकों पर इसका विपरित परिणाम दिखाई है। यह अनुवाद उन्हीं पाठकों को अधिक पसंद आयेगा जिसके सांस्कृतिक पक्ष अनुवाद से जुडते हो। अनुवादक यह कार्य कई बार अनजाने में भी करता हैं।
६.भाषाई स्तर में भिन्नता निर्माण करना - भाषाई स्तर का उपयोग अधिकतर संप्रेषण के रुप में होता है। दो व्यक्तियों के बीच में किस स्तर में संप्रेषण हुआ उस संप्रेषण का अनुवाद किस भाषा स्तर में अनुवादक करना चाहता है या करता है उससे दो व्यक्तियों के वीच के सामाजिक सतर एवं आर्थिक सतर की पहचान होगी।
७.संकेत स्थलों में भिन्नता दिखाना - संकेत स्थल भषा एवं संस्कृति के द्योतक होते है जिससे दो भाशाओं एवं संस्कृति की पहचान होती है अनुवादक को ऎसे संकेतों का अनुवाद नहीं करना चाहिए। या करें तो दोनों की कोटियाँ एवं क्षेत्र समान हो। अगर वह एसा नहीं करता तो जरुर वह कुछ और करने की सोच रहा है।
८.नाम, सर्वनाअम, और क्रिया रुपों में भिन्नता दिखाना।
९. व्याकरणिक शब्दों में भिन्नता दिखाने से भी अनुवाद में भिन्नता निर्माण होती है।
१०.वैचारिक (विचार) के स्तर में भिन्नता दिखाना।
११.वर्तमान काल, भविष्य काल और भूतकाल के वाक्यों में जान बूजकर भिनाता
निर्माण करना।
१२.शब्दों और वाक्यों के लिंगों मे परिवर्तन करना। ( जैसे – स्त्री लिंग का
पुलिंग करना)
अनुवाद के समय जान बुझकर बदलाव करना और पाठक को मूल पाठ के लक्ष्य से दूसरी ओर ले जाना अनुवाद की राजनीती(Politics In Translation)का प्रमूख लक्ष्य होता है। जिसे पाठक तभी समझ पायेगा जब वह मूल पाठ और अनूदित पाठ को पढेगा। यह कार्य एक अनुवादक दूसरे अनुवादक अनुवाद पढकर। अनुवाद की राजनीति का पोल खोल सकता है। सामान्य पाठक यहीं समझता हैं कि अनुवादक ने अनुवाद सही रुप में नही किया। जिसके कारन वह बाकी अनुवादों को भी गलत या अनुवाद निम्न स्तर के होते हैं। यह भावना अपने मन में बना लेता है। अगर अनुवाद अनुवाद की राजनीति(Politics In Translation) करने में सफल होता है, तो पाठक के मन में मूल पाठ के प्रति द्वेश निर्माण हो सकता है। जिससे मूल रचना के प्रति समाज में असंमजस की स्तिथि निर्माण हो जाती है।
अनुवाद में व्यवसाय के रुप में किया जाने वाला अनुवाद या जल्द बाजी में किए जाने वाले अनुवादओं में हुए भूलों को हम माफ भी कर सकते है या ऎसे अनुवाद भूलों अथवा अज्ञान का नमूना पेश करते है। लेकिन सोच समझकर की गई भूलों को कैसे सुधारे। जो पाठ अनुदित होकर प्रकाशित हो जाता है उसके बाद वह पाठ अनुवादक का नहीं रह पाता और उसे फिर से उस पाठ को प्रकाशित करने में कई वर्षों तक इंतजार करना पड सकता है। कई अनुवादक मूल पाठ का अनुवाद इसी लिए करते है कि अनुवाद से कुछ धन समाया जाए। लेकिन कुछ अच्छे अनुवादक पैसे कम मिलने वाले है इस सोच से भी अनुवाद ठिक से नहीं करते। इस क्रिया में प्रकाशक भी कई बार शामिल होते हैं। वे अनुवादक पर दबाव डालते हैं कि निश्चित समय, और कम से कम पृष्ठों में अनुवाद होना चाहिए ? अनुवाद के लिए इतने ही रुपए मिलेंगे ? इन सवालों के कारण भी अनुवादक अनुवाद करने से पुर्व कुछ सोचकर ही अनुवाद हाथ में लेता है। अनुवादक केवल गलत अनुवाद करने के लिए या अनुवाद में हेर-फेर करके ही राजनीति नहीं करता तो वह किसी समाज, व्यक्ति, या लेखक की प्रतिष्ठा बढाने के लिए या घाटाने के लिए राजनीति कर सकता है।
अब अनुवाद की ओर देखा जाए तो आज अनुवाद उस भूमिका में नहीं रहा जिसे केवल शब्द से शब्द अनुवाद की प्रक्रिया में बांध कर रहना पडे। आज कई एसे अनुवादक विद्वान है जो अनुवाद में अनुवाद की राजनीति का मंत्र अपनाते है। यह क्रिया या खेल सभी अनुवादकों या अनुवाद पहली बार कार्य कर रहें अनुवादक नहीं कर सकतें। यह कार्य एक कुशल या अनुभव पूर्ण अनुवादक ही कर सकता है।

हिंदी अनुवाद शिक्षण के लिए टाईम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक लेख (Education in Hindi translation/ job in Hindi)

 

हिंदी अनुवाद शिक्षण के लिए टाईम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक लेख (Education in Hindi translation/ job in Hindi)

हिंदी अनुवाद शिक्षण के लिए टाईम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक लेख
(Education in Hindi translation/ job in Hindi)

Forgive your friends, for they know not what they speak! In fact, Hindi is becoming a popular subject at the college level, even in prestigious campuses like Delhi University. You could either teach in school after doing your Bed or join the print or electronic media as a journalist, web content creator, announcer, newsreader, anchorperson or scriptwriter or travel guide.
The proliferation lf the media 100+TV channels and soon 300+FM stations-has spawned the need for youngsters who can communicate with style, ease and competence in Hindi (preferably bilingual).
If you have a way with words, you could also become a copywriter in an advertising agency, technical writer public relations executive or join the tourism industry. Mahatma Gandhi Antarrashtriy Hindi Vishwavidyalaya, Wardha (a Central University) offers a postgraduate diploma in cultural tourism management. Details are available on http://www.hindivishwa.org/.
An additional course in PR, journalism, advertising or mass communication would give you the necessary professional edge.
Familiarity with another language can open up avenues in translation amongst others. Several universities offer one-year diploma courses in translation for graduates.
Hindi translators are recruited by various government departments including the ministry of home affairs and ministry of external affairs.
In situation like the National book Trust, the Bharatiya Gyanpeeth, the Sahity Akademi, the sangeet-Natya Akademi, the Central Hindi Directorate, The National School of Drama and the Bureau of Translation also support talented and upcoming translators.
They are also required in foreign embassies, banks, print and electronic media, theatre, film industry, advertising and pr and travel agencies, MNCs, etc.

The typical eligibility required is a Masters degree in Hindi/English as the main subject.
There is also a large requirement for people who can do DTP work in Hindi. Knowledge of computers and good typing skills would be very helpful in this area. Domestic call centre’s, particularly in North, also require people with good spoken Hindi.
Hindi being our national language, there are several jobs at the clerical level and for typists and stenographers in banks and government offices.
You can also opt for teaching at the higher level there are a lot of universities and colleges perpetually short of faculty.
And if that’s not enough, there is a need for Hindi language teachers even in the US!
-Kokila Juneja

LEXICAL AMBIGUITY IN HINDI–MARATHI MACHINE TRANSLATION SYSTEM हिंदी-मराठी अनुवाद में शाब्दिक अस्पष्टता (समान उच्चारण वाले शब्दों के संदर्भ में)

 

LEXICAL AMBIGUITY IN HINDI–MARATHI MACHINE TRANSLATION SYSTEM

 हिंदी-मराठी अनुवाद में शाब्दिक अस्पष्टता (समान उच्चारण वाले शब्दों के संदर्भ में)

LEXICAL AMBIGUITY IN HINDI–MARATHI MACHINE TRANSLATION SYSTEM
(IN THE CONTEXT OF HOMONYMY)
Kamble Prakash Abhimannu JNU N. Delhi – 67
prakash.office09@gmail.com

In the age of modernization, linguists cannot forget that India is a multilingual country. Problem of multilingualism was solved by translation but in the age of information technology machine is the competitor of language. In the field of machine translation there are many problems. One of the major problems is homonymy disambiguation. This issue is being considered at the world level. This is good opportunity for us to discuss this subject in the context of Indian languages. The problem of Homonymy is not only in machine translation but also in the area of Human Translation, quick translations (interpretation), new language learners (Language Acquisition), and young children of normal intelligence, Artificial Intelligence specialists, because it causes word ambiguity. The homonymy words come from original words (Tatsam, Tadbhav) of native languages or dialects. These words can also be combinations of foreign languages and Hindi form. Homophones are pronounced with the same sound but have different meaning. Because Devanagari script is sound based (Dhwanimulaka), if there is a difference in pronunciation then the difference appears in the spelling also.
Before proceeding to the formula of Homonymy words problem of Disambiguation, a detailed explanation of these terms and introduction is important because it helps in understanding the original depth of the problem.
Homonymy word definition: -“In linguistics, a Homonym is one of a group of words that share the same pronunciation but have different meanings, and are usually spelled differently or same.”[1]
The above definition can be interpreted that” the same pronunciation ambiguous word combinations, that often have the same accent, but their meaning is different and spellings could be same or different." A few words in Hindi have similar pronunciations, the meaning is also same, but have different spellings, but the number of these words is very less. These words are Exceptions in homonymy. Homonymy is divided in many types, let’s see what they are, so that more and more modified forms of the words can be found which will help us in moving on.

Samepronunciation
Differentpronunciation
Samespelling

Differentspelling

१. HOMOGRAPHS
२. HOMOPHONES
३. HETERONYMS

Homonym
Homograph
Homophone
Heteronym/Heterophony
४. POLYSEMES
५. CAPITONYMS

We can categorize words on the combinations of Pronunciation, Homograph and ambiguity so that we can easily understand the difference in words like homophony and Homograph.
Kinds of Hindi Homonymy:-
No
Spelling
pronunciation
Meaning

1.
Same spelling
Same
pronunciation
different meaning
2.
Different spelling
Same
pronunciation
different meaning

In the lexical data the word sense is decided on the basis of word derivation or grammatical category. But the problem arises when the computer reads Lexical Data which has been given in order of lexicon in the storage input. But output is not identical with the input used in the sentence because this formula is not good to identify the sense of the sentence. In the source language Lexical data doses not refers to the group sense because of this computer dictionary are not able to obtain transfer true sense in the target language. It is necessary to increase the percentage of Dictionary refers sense meaning with the mathematical algorithmic programs and linguistically formed algorithmic programs that help in increasing sense meaning. According to the partition of Homonymy word and grammatical category can be useful to get the correct meaning and sense. But translators and the general public frequently ask the same question that “the best existing program through only a series of option, translator got to do can be presented as or better than the best selection to do a translation.”[2] The answer to this question on algorithm can also be given by homonymy disambiguation. Even with the same focus on amendment, big problems can be divided in small parts to make it easy to solve them. When the Small problems will be solved, big problems will be automatically solved with them. Similarly This Paper is a part of one of the biggest problem in machine translation; it is an effort to resolve ambiguity. That is taken account by the Following translation from Hindi to Marathi. In this paper Hindi is a source language. The problem of Homonymy first originates in source language because so more attention is given to Hindi. It is necessary to solve the problem in the same language. The target language can be used only to translate the solution (meaning) of the problematic homonymy words. Some examples are given below.
Homophone (Same pronunciation – same spelling – different meaning)
No
Hindi word
Grammatical
category
Hindi
meaning
Marathi meaning
1
कुल/kul
Noun, Mas, Singular,
कुनबा/joad
कुळ/kul (naun,mas, singular)

कुल/kul
Noun, Mas, Singular
जोड़/joad
एकूण/ekun (Noun,mas,singular )
2
अचल/achal
Adj
पर्वत/parvat
पर्वत/parvat (Adj)

अचल/achal
Adj
स्थिर/darja
स्थिर/sthir (Adj)
3
कोटि/koti
Noun, Fem
दर्जा/darja
दर्जा/darja (noun,masc)

कोटि/koti
Noun, Fem
करोड़/karod
करोड/karod (Adj)
Table No- 1
The words are represented by graph and graphs are useful in solving the problem of homonymy in Hindi and devnagari scripts. A problem like homophony depends on the pronunciation and in Hindi; pronunciation depends on the shape of the word. Each word has a different shape and meaning. The first task should be to find the correct meaning through the shape of the word because meaning is the soul of the language. This would help in the case of differently shaped words but not for the similar ones. The problem of similar shaped words can be solved only by using algorithm, corpus and grammar. This would not be very difficult because the number of similar shaped words and similarly pronounced words is very less.
Similar pronunciation-homophonic-different spelling-different meaning (Homophons)
No
Hindi word
Grammatical
Category
Hindi Meaning
Marathi meaning
1
दिन/din
Noun Mas.
दिवस/divas
दिवस(Noun mas.)

दीन/deen
Adj/N
गरीब/garib
गरीब (Adj.)
2
बलि/bali
Noun Mas.
बलिदान/balidan
बलि (Noun,Mas)

बली/balee
Adj.
बलवान/balavan
शक्तिशाली (Adj.)
3
बाजि/baji
Noun Mas.
घोड़ा/ghoda
घोडा (Noun, Mas)

बाज़ी/bazee
Noun Fem.
दाँव/danv
बाजी (Noun,Fem)
Table No:- 2
In Hindi the difference in spelling means difference in pronunciation. Word pairs like aviraam-abhiram; sam-sham; asan-asann are similarly pronounced. But in English words can be found that have different spellings but the same pronunciation like – wood-would; know-no; pain-pen; sun-son; etc. These words are called “homophones” in English.[3] Although the same sound –different meaning words are not really homograph, but still they can be equated with homophones. Though homophones are recognized by dwanyatmakata but this problem loses its importance in Hindi because of the different spellings. It can be solve easily by algorithm.
Some nouns are unclear like homonyms, that have same pronunciation but their meaning is different. They have the same spelling and sound.

Homophones (Same pronunciation – Same sound-same spelling- different meaning )
No
Hindi word
Grammatical
Category
Hindi Meaning
Marathi meaning

देव/dev
Noun Mas.
भगवान
देवता (Noun,Mas)

देव/dev
Noun
नाम
नाव (Noun)

धवल /dhaval
Adj.
सफेद
पांढरा(Adj)

धवल/dhaval
noun
नाम
नाव (Noun)

दिवाकर/divakar
Noun Mas.
सूर्य/sury
सूर्य (Noun,Mas)

दिवाकर/divakar
noun
नाम/nam
नाव (Noun)
Table no. 3
The problem of ambiguity ‘same sound-different meaning’ words is equally found in all the languages. Especially in the Nouns that are frequently used in daily life. Young children and machines have to face a lot of difficulties because of them. But Scholars cannot put these words under homonymy. Therefore they are not being researched.
Same pronunciation–Different sound– same spelling–different meaning (Homograph)
No
Hindi word
Grammatical
Category
Hindi Meaning
Marathi meaning

टेस्ट/taste
Noun
स्वाद/swad
चव/chav (Noun)

टेस्ट/test
Verb transitive
इम्तहान/imtiyan
परिक्षा/parikShya(Noun)

इंटरेस्ट/interest
Noun
दिलचस्पी/dilchaspi
रुचि/ruchi (Noun)

इंटरेस्ट/interest
Verb transitive
ब्याज/byaj
व्याज/vyaj (Verb Tran.)

कंडिशन/condition
Verb transitive
हालत/halat
परस्थिति/paristhiti(Verb Tran.)

कंडिशन/condition
Verb transitive
प्रतिबंध/pratibandh
नियम/niyam(Verb Tran.)
Table no. 4
The practice of taking words from other languages is a practice of language development but the other side of this language development is an increase in homonymy, which creates ambiguity in the language. In Hindi there are a lot of words which came from many languages. Despite similarities in the sound and the pronunciation words have different meanings. Dr. Tribhuvan Ojha(1994) has divided these words in three categories that can clarify the meanings a little.
1. Words that have been assimilated in Hindi with their original pronunciation fall in this category. Like - June, foot, boot etc.
2. In this category are words that have been accepted in Hindi with minimal sound change.
Like- chauk (chalk), acaadamee(academy)
3. Words that are tadbhav forms of English words. Like bam (bomb), kaag (cork) etc.
These kinds of words can be clarified by categorizing them grammatically with meaning specification.
The simplest language game is the naming game in which all objects are uniquely identifiable, like persons, but unlike chairs or apples. Such objects can be categorized with uni-referential categories. Because of this, each object can be uniquely named or labeled with a proper name. If in this setup both the speaker and the hearer know the topic (for example because the speaker points to it as is commonly done in many experiments and models), and if the probability of re-inventing an existing word is zero, then no homonymy can arise: an agent can always associate the correct meaning with an unknown and unique word. The most important task is to disambiguate the homonyms using language tools more and more. Such as: - corpus, tagger, morphological analyzer and special dictionary in which only homonyms lexical data. So that work can be sped up.
I put here Some Common Methods to resolve Hindi-Marathi machine translation Homonymy ambiguity. First preference is to create a special dictionary for homonymy. In this dictionary only those words will be entered that are a type of homonymy with categories by homonymy type Homograph, Homophone, Polysemy, Heteronyms, Capitonyms. In this dictionary we enter the sentence which is more useful to that special word disambiguation word; this is only a sentence example. By this sentence we take right word sense and meaning. This example sentences are of three or four types which are using any homonymy single word. Four type of Useful lexical data collection for homonymy is
(1) Baseline (Unmodified)
(2) Hindi-Marathi homonymy lexical data with sentence and examples (Additional
Homonymy added words)
(3) Homophone (Additional Homophone)
(4) Homograph words (Additional Homograph)
The second method that I prefer to go with is Contextual method of functional homonymy disambiguation, developing for every functional homonymy type group of rules defining the syntactic context of the homonym disambiguation and forming the group control structure which defines the rule application order. Text analysis is one of the good examples to get the exact sense, as rather frequently a syntactic method of building homogeneous groups is used in homonymy disambiguation. In this analysis also we use a pre-syntactic analysis technique of homonymy disambiguation effective at the stage of sentence analysis. Provide Grammatical, world knowledge and linguistic level knowledge to system about the word. Morph syntactic analysis and Lexical-semantic analysis is also useful in this tool. To develop a “One Subsystem provides the realization of homonymy disambiguation method based on collocations and the one based on the ontology linguistic frame. In the development of these methods, the engineering approach is used, which allows selecting the typical frequent language cases, which are actively used in technical language.”[4] Some useful language tools 1.Morphological analyzer 2.Tagger 3.Spacial Dictionary 4. Chunker 5. Ontological tools 6. word net.
Sometimes corpus gives only an accumulation of information but this term is not useful to disambiguate the homonymy word, rather the utility should be focused on the target.

Like:- १.१ आना (Noun)=(हिंदी) <भिखारी> <का> <आठ> <आना> <खो> <गया>
(मराठी) <भिका-याचे> <चार> <आने> <गमावले> <.>
२. आना (Verb) (हिंदी) - <उसका> <आना> <मेरे> <लिए> <कितना> <सुखद> <था> <।>
(मराठी) - <त्याच> <येणं> <माझ्या> <साठी> <किती> <सुखद> <होतं> <.>


with the help of homonymy word dictionary corpus can be modified clarity must come in the meaning of given sentence in the corpus.
In this paper care has been taken that just simplification of meaning transfer is not done. This effort is to make such a mechanism that can convey the minimum meaning itself. This Paper presented Hindi-Marathi Machine translation in the context of the literal searching of correct meaning, to mark the ambiguity of effort and minimum but successful communication tool.

Reference: -
1. A cross-situational learning algorithm for damping homonymy in the guessing game
- Joachim De Beule1, Bart De Vylder1 and Tony Belpaeme2
Vrije Universiteit Brussel, Belgium
University of Plymouth, United Kingdom

2. Integral Technology of Homonymy Disambiguation in the text mining system “LOTA”
- Olga Nevzorova, Vladimir Nevzorov, Julia Zin'kina, Nicolay Pjatkin

3. Particle Homonymy and Machine Translation
- K6roly F&bricz, JATE University of Szeged, Egyetem u. 2.
Hungary I[ - 6722
4. Children’s difficulty in learning homonyms*
- MARTIN J. DOHERTY
Department of Psychology, University of Stirling
5. Native and L2 processing of homonyms in sentential context
- Kerrie E. Elston-Gu¨ ttler*, Angela D. Friederici
Max Planck Institute of Human Cognitive and Brain Sciences, Leipzig, Germany
6. Particle Homonymy and Machine Translation
- K6roly F&bricz, JATE University of Szeged,
Egyetem u. 2.
Hungary I[ - 6722
7. Learning Form-Meaning Mappings in Presence of Homonymy: a linguistically motivated model
of learning inflection
- Katya Pertsova, University of California Los Angeles
8. प्रामाणिक हिंदी शब्द-रचना एवं वर्तनी प्रकाश -
9. हिंदी में अनेकार्थता का अनुशीलन – डॉ.त्रिभुवन ओझा करीम सिटी कॉलेज, जमशेदपुर,
विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी
10. कंप्यूटर अनुवाद:प्रयोग और विधि–प्रो.रीतारानी पालिवाल, अनुवाद पत्रिका (कंप्यूटर अनुवाद विशेषांक-२) अप्रैल-
जून २००४ पेज-५९
Web Site : - 1. http://en.wikipedia.org/wiki/Homonym
2. http://assortedmaterial.googlepages.com/EnglishIndex.html
3. http://www.tribuneindia.com/2000/20000819/windows/roots.htm
[1] http://en.wikipedia.org/wiki/Homonym
[2] [2] कंप्यूटर अनुवाद:प्रयोग और विधि – प्रो.रीतारानी पालिवाल, अनुवाद पत्रिका (कंप्यूटर अनुवाद विशेषांक -२) अप्रैल-जून २००४ पेज - ५९
[3] हिंदी में अनेकार्थता का अनुशीलन – डॉ.त्रिभुवन ओझा करीम सिटी कॉलेज, जमशेदपुर, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी १९९४ पेज - ७७

[4] INTEGRAL TECHNOLOGY OF HOMONYMY DISAMBIGUATION IN THE TEXT MINING SYSTEM "LOTA"
- Olga Nevzorova, Vladimir Nevzorov, Julia Zin'kina, Nicolay Pjatkin