Saturday, November 23, 2024

वापसी - उषा प्रियंवदा वापसी कहानी का सार

 

वापसी - उषा प्रियंवदा

वापसी कहानी का सार

       उषा प्रियंवदा हिन्दी प्रवासी साहित्य की एक प्रमुख लेखिका हैं। इनका जन्म २४ दिसम्बर १९३० को कानपुर में हुआ था। उषा जी ने अपनी शिक्षा अंग्रेजी में प्राप्त की और बाद में श्रीराम कॉलेज दिल्ली, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और विस्कांसिन विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई विभाग में अध्यापन कार्य किया। वे नई कहानी आंदोलन की महत्वपूर्ण लेखिका हैं और महिला कथाकारों में विशिष्ट स्थान रखती हैं। उनके प्रमुख कहानी-संग्रहों में 'जिन्दगी और गुलाब के फूल', 'एक कोई दूसरा' और 'कितना बड़ा झूठ' शामिल हैं। इनकी कहानियाँ मुख्यतः मध्यमवर्गीय जीवन की सुख-दुःख, आशा और निराशा के संघर्ष को व्यक्त करती हैं।

यह कहानी गजाधर बाबू के रिटायरमेंट के बाद के अनुभवों पर आधारित है, जिसमें वह अपने घर और परिवार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं। कहानी में गजाधर बाबू की नौकरी के दौरान की एकल ज़िंदगी और अब रिटायरमेंट के बाद अपने परिवार के साथ रहने की खुशी और उसके साथ जुड़े कुछ खट्टे-मीठे अनुभवों का चित्रण किया गया है। गजाधर बाबू जब कमरे में रखे सामान को देख रहे होते हैं, तो उनका मन एक अजीब तरह के विषाद से भर जाता है। घरवाली और गनेशी से हुई बातचीत से यह संकेत मिलता है कि वह उन पुराने, परिचित रिश्तों को छोड़ने के बाद एक नई शुरुआत की ओर बढ़ रहे हैं। घर में बच्चों और पत्नी के साथ रहने की खुशी में भी उन्हें यह एहसास होता है कि उनका परिवार अब पहले जैसा नहीं रहा। बच्चों के बढ़े हुए कर्तव्य और उनके जीवन में बदलाव ने उनके मन में असंतोष और अकेलेपन के भाव पैदा किए हैं। घर के माहौल में बदलाव, पत्नी की शिकायतें और बच्चों का व्यस्त रहना, गजाधर बाबू को एक अस्थायित्व का अहसास कराता है। वह अपने पुराने दिनों को याद करते हैं जब गनेशी उनके लिए गरम-गरम जलेबी और चाय लाता था, और पत्नी की स्नेहपूर्ण बातें उन्हें हमेशा याद आती थीं। लेकिन अब उनका जीवन उन सुखद यादों से अलग हो चुका है, और वह अपने परिवार के साथ भी रिश्तों के टूटने और बदलाव का सामना कर रहे हैं।

      गजाधर बाबू की पत्नी की शिकायतों और परिवार के भीतर चल रही हलचल से गजाधर बाबू में निराशा और खिन्नता का भाव उत्पन्न होता है। उन्हें यह अहसास होता है कि वह जो स्नेह और आदर की कल्पना करते थे, वह अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। अपनी पत्नी की शारीरिक और मानसिक स्थिति को देखकर उन्हें लगता है कि उनकी पत्नी अब उस युवा और प्यारी महिला की तरह नहीं रही, जिसकी यादों में उन्होंने अपना पूरा जीवन जी लिया था। कहानी का समापन गजाधर बाबू की मानसिक स्थिति को दर्शाते हुए होता है, जिसमें वह अपने परिवार के बदलाव और रिश्तों की अस्थिरता को महसूस करते हैं।

        कहानी का केंद्रीय पात्र गजाधर बाबू हैं, जो एक वृद्ध और संकोची व्यक्ति हैं। उनकी जिंदगी की मुख्य समस्या उनके परिवार के साथ उनके संबंधों और गृहस्थी में उनकी घटती भूमिका से संबंधित है। गजाधर बाबू की पत्नी, बेटे अमर, बहू, और बेटी बसंती के साथ उनके संबंध जटिल हैं। वह परिवार में कुछ खास स्थान नहीं रखते और अपनी कड़ी मेहनत के बावजूद घर में उनका योगदान अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। कहानी की शुरुआत एक साधारण घटना से होती है, जब गजाधर बाबू की पत्नी की शिकायतों के कारण घर का माहौल तनावपूर्ण बन जाता है। पत्नी अपने गृहस्थी के कामों के प्रति असंतुष्ट रहती हैं और बार-बार गजाधर बाबू पर ताने देती हैं। बसंती, उनकी बेटी, भी घर के कामों में लापरवाह है, जिससे परिवार में झगड़े की स्थिति बनती है। गजाधर बाबू की बेटी और बहू के व्यवहार से वह दुखी होते हैं, लेकिन वह चुपचाप सब सहन करते रहते हैं। उनका जीवन एक रूटीन में बदल चुका है और घर के भीतर उनकी कोई अहमियत नहीं रह गई है।

      गजाधर बाबू की पत्नी और बच्चे अक्सर उनके अस्तित्व को नजरअंदाज करते हैं और परिवार के मामलों में उनकी कोई भूमिका नहीं रहती। यह स्थिति गजाधर बाबू को मानसिक रूप से हतोत्साहित करती है, क्योंकि वह महसूस करते हैं कि उनके साथ अब कोई भावनात्मक संबंध नहीं रह गए हैं। वह सोचते हैं कि घर में केवल पैसे की अहमियत है और उनका जीवन एक परिधीय भूमिका में सिमट कर रह गया है। एक दिन वह यह निर्णय लेते हैं कि वह अब परिवार के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और चुपचाप सब कुछ होने देंगे। गजाधर बाबू के अंदर यह भावना विकसित होती है कि उनकी पत्नी और बच्चों ने उन्हें सिर्फ एक स्रोत के रूप में देखा है, और वे उन्हें केवल घर के खर्च के लिए उपयोगी मानते हैं। उन्हें लगता है कि उनका अस्तित्व अब परिवार में महत्त्वहीन हो चुका है। फिर भी, जब घर में एक और समस्या उत्पन्न होती है — जैसे कि नौकर को काम से निकाल दिया जाता है — तो गजाधर बाबू अप्रत्याशित रूप से दखल देते हैं। यह उनकी स्थिति के बारे में एक और संकेत है कि वे अब भी अपने परिवार के भीतर अपनी अहमियत को महसूस करना चाहते हैं, लेकिन यह केवल अस्थायी राहत देता है।

       अंततः, गजाधर बाबू अपने परिवार के साथ अधिक समय बिताने के लिए एक नौकरी का प्रस्ताव स्वीकार करते हैं, लेकिन जब वह अपनी पत्नी से यह पूछते हैं कि क्या वह उनके साथ चलेंगी, तो पत्नी इसे नकार देती है। गजाधर बाबू को यह एहसास होता है कि उनका परिवार अब पूरी तरह से उनसे विमुख हो चुका है और वे एक अनावश्यक भार की तरह हो गए हैं। इस दुखद स्थिति के बाद, गजाधर बाबू अंत में अपना सामान लेकर घर छोड़ने का निर्णय लेते हैं। उनका परिवार उनके जाने के बाद भी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त रहता है, और गजाधर बाबू का कोई भी असर उन पर नहीं होता। कहानी इस बात की ओर इशारा करती है कि कैसे समय के साथ परिवारिक रिश्ते बदल जाते हैं, और व्यक्ति का अस्तित्व तब खो जाता है जब वह अपने परिवार के लिए केवल एक आर्थिक स्रोत बनकर रह जाता है। गजाधर बाबू का दुख और उनकी उदासी इस बात का प्रतीक है कि परिवार में प्यार और समझ की कमी होने पर व्यक्ति अकेला और अप्रासंगिक महसूस करने लगता है।

       इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि परिवारिक संबंधों में समझदारी और सम्मान की आवश्यकता होती है। गजाधर बाबू का जीवन इस बात का प्रमाण है कि जब किसी व्यक्ति को परिवार में भावनात्मक समर्थन और सम्मान नहीं मिलता, तो वह अपने अस्तित्व को नकारा हुआ महसूस करता है। यह कहानी यह भी दर्शाती है कि आर्थिक योगदान से अधिक परिवार में प्यार, सहानुभूति और आपसी समझ का महत्व है। गजाधर बाबू का दुख यह है कि उनका परिवार उन्हें एक व्यक्ति के रूप में नहीं देखता, बल्कि केवल एक धन के स्रोत के रूप में मानता है। परिवार में रिश्तों की अहमियत समय के साथ कम हो सकती है, लेकिन इस कहानी के माध्यम से यह समझ में आता है कि एक व्यक्ति की भावनाओं और अस्तित्व का सम्मान किया जाना चाहिए। अंत में, यह कहानी हमें यह सिखाती है कि यदि हम अपने परिवार में एक दूसरे की भावनाओं को समझने और उन्हें सम्मान देने में विफल रहते हैं, तो हम रिश्तों में दूरी और अकेलेपन का सामना कर सकते हैं। परिवार का असल उद्देश्य सिर्फ शारीरिक और आर्थिक मदद देना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखना भी है।