कबीर और सर्वज्ञ
कबीर और सर्वज्ञ दोनों ही संतों
ने मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए परमात्मा को निर्गुण और निराकार रूप में माना है।
इन दोनों का दर्शन उस समय के धार्मिक आडंबरों और बाहरी पूजा-पाठ के विरोध में था, जहाँ
लोग सिर्फ मूर्तियों की पूजा करके धर्म का पालन मानते थे। इन संतों के अनुसार, परमात्मा
का असली रूप न तो किसी मूर्ति में है और न ही बाहरी कृत्यों में, बल्कि वह हर व्यक्ति
के भीतर, उसके आत्मा में स्थित है। यह विचार कबीर और सर्वज्ञ के सशक्त दर्शन का आधार
है, जो धर्म को सरल, सहज और व्यक्ति के भीतर छिपी सच्चाई से जोड़ते हैं।
कबीर का दृष्टिकोण
कबीर के अनुसार, बाहरी आडंबर
और धार्मिक कर्मकांडों से कोई फायदा नहीं होता। उनका प्रसिद्ध दोहा “पाहन पूजै हरि मिलै तो मैं पूजूं पहार, ताते यह चाकी भली
पीस खाय संसार” इस दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है। कबीर कहते हैं कि
अगर भगवान की पूजा केवल पत्थर की मूर्ति से होती है, तो उन्हें पहाड़ की पूजा करनी
चाहिए, क्योंकि पहाड़ भी पत्थर से बना है। इसके विपरीत, चक्की का उपयोग संसार के भले
के लिए होता है। उनका यह कथन दर्शाता है कि धर्म केवल बाहरी रूपों में नहीं, बल्कि
आंतरिक साधना में निहित है। कबीर का यह विचार है कि भगवान का अनुभव हृदय में, आत्मा
में होता है, न कि किसी मूर्ति या तीर्थ स्थल में। कबीर ने "मन मथुरा, दिल द्वारिका, काया
काशी" कहकर यह स्पष्ट किया कि भगवान का निवास हमारे हृदय में
है, न कि मथुरा, द्वारिका या काशी जैसे भौतिक स्थानों में। इसके द्वारा कबीर यह संदेश
देना चाहते हैं कि परमात्मा किसी विशेष स्थान या मूर्ति में नहीं बल्कि मनुष्य के भीतर
स्थित है, और आत्मा के माध्यम से हम उसकी प्राप्ति कर सकते हैं।
"साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।, जाके हिय में
साँच है, ताके हिय में आप।" यह दोहा कबीर के सत्य के प्रति दृष्टिकोण को स्पष्ट
रूप से दर्शाता है। कबीर के अनुसार, सत्य ही सर्वोत्तम तप है, क्योंकि यदि मनुष्य सत्य के मार्ग पर चलता
है, तो वह ईश्वर से जुड़ता है। उनका कहना है कि यदि व्यक्ति का हृदय सत्य से परिपूर्ण
है, तो वही व्यक्ति ईश्वर का वास्तविक रूप देख सकता है। कबीर यहां यह बताना चाहते हैं
कि सत्य का पालन ही वास्तविक तपस्या है, और झूठ बोलना सबसे बड़ा पाप है। उन्होंने
यह भी कहा कि जो व्यक्ति सत्य को अपने हृदय में स्थापित करता है, वही परमात्मा को पाता
है। यहां सत्य केवल शब्दों में नहीं, बल्कि विचारों और कर्मों में भी होना चाहिए। यह
कबीर का गहन संदेश था कि सत्य के बिना जीवन का कोई मूल्य नहीं।
सर्वज्ञ का
दृष्टिकोण
सर्वज्ञ भी कबीर के समान ही मूर्तिपूजा
के खिलाफ थे। उन्होंने अपने वचन "गधा लोटे राख में, क्या यति बनेगा, तत्व जाने बिना भस्म-धारण करेगा जो"
में यह कहा कि बिना सच्चे ज्ञान के भस्म धारण करने और बाहरी आडंबर करने से कोई मुक्ति
नहीं मिल सकती। उन्होंने यह उदाहरण दिया कि जैसे गधा राख में लोटता है और फिर भी गधा
ही रहता है, वैसे ही जो व्यक्ति बाहरी रूपों में फंसा रहता है, वह अपनी असल साधना से
दूर रहता है। सर्वज्ञ का यह संदेश था कि अगर हमें मुक्ति प्राप्त करनी है, तो हमें
बाहरी पूजा-पाठ से ऊपर उठकर आत्मा की शुद्धि और ज्ञान की साधना करनी चाहिए।
सर्वज्ञ का यह कथन "देह देवालयवु, जीववे शिवलिंग"
भी इस विचार को समर्थन देता है। उन्होंने कहा कि शरीर ही देवालय है और आत्मा ही शिवलिंग
है। यह विचार मूर्तिपूजा के खिलाफ है, क्योंकि यहां वह कह रहे हैं कि जब हमारा शरीर
ही देवालय है, तो हमें किसी बाहरी मूर्ति की पूजा की आवश्यकता नहीं। ईश्वर का असली
रूप हमारे भीतर है, और हमें इसे महसूस करने के लिए आत्मा की शुद्धि की आवश्यकता है।
मूर्तिपूजा
का विरोध
कबीर और सर्वज्ञ दोनों ही मूर्तिपूजा
के खिलाफ थे। कबीर के "पाहन पूजै हरि मिलै तो मैं पूजूं
पहार" में उनका यह संकेत था कि किसी पत्थर के सामने सिर झुकाने
से धर्म की कोई वास्तविक प्राप्ति नहीं होती। सर्वज्ञ भी "पीस कर चन्दन भाल पर धारण करने से यदि सीधे स्वर्ग
पहुँचोगे तो सान क्यों नहीं जाता स्वर्ग" जैसे उदाहरण देकर मूर्तिपूजा
की भ्रामकता को उजागर करते हैं। उनका कहना था कि जब तक व्यक्ति का मन शुद्ध नहीं होगा,
तब तक किसी भी बाहरी पूजा-पाठ से कोई फायदा नहीं है। सर्वज्ञ ने भी सत्य के महत्व को
अपनी वाणी और विचारों के माध्यम से व्यक्त किया। उनका प्रसिद्ध उद्धरण है:
"सत्यरा
नुड़ी तीर्थ नित्यरा नडेतीर्थ, उत्तमर संगवदु तीर्थ हरिन,
निरेत्तनदु तीर्थ सर्वज्ञ।" यह उद्धरण सर्वज्ञ के सत्य के
प्रति दृष्टिकोण को दर्शाता है। वह मानते हैं कि सत्य
बोलने और आचार में सत्य का पालन करना ही वास्तविक तीर्थ यात्रा है। उनके अनुसार, सत्य बोलने वाले व्यक्ति की वाणी ही तीर्थ है, और उसका आचार भी एक पवित्र स्थान की तरह
होता है। सर्वज्ञ के अनुसार, सत्य में ही मुक्ति का मार्ग है, और सत्य का पालन करने से मनुष्य को ईश्वर
का साक्षात्कार होता है। उन्होंने यह विचार व्यक्त किया कि सत्य से बढ़कर कोई और तीर्थ नहीं है, और यही जीवन का सबसे बड़ा पुण्य है।