Tuesday, December 24, 2024

1.रहीम के दोहे – रहीम

  

1.रहीम के दोहे – रहीम

कवि परिचय: अकबर के नौ रत्नों में से एक रत्न अब्दुर्रहीम खानखाना का जन्म 1556 लाहौर में एवं निधन 1627 दिल्ली में हुआ था। रहीम ने जिन्दगी में अनेक उतार-चढ़ाव देखे थे। जब वे चार साल के थे, उसी समय पिता बैरम खाँ की हत्या कर दी गई थी। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के तीन-तीन पीढ़ियों के साथ काम करने वाले रहीम बहुप्रतिभावान व्यक्तित्व के स्वामी थे। वे वीर यौद्धा सेनानायकचतुर राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ थे तो दूसरी ओर मानवीय गुणों से ओत प्रोत कोमल ह्र्दय कवि थे। अरबीफारसीतुर्कीसंस्कृत भाषा के ज्ञाता होने के साथ-साथ हिन्दी भाषा से भी रहीम को विशेष लगाव था। बरवै नायिका भेदखेट कौतुक जातकमदनाष्टकरहीम रत्नावलीरहीम दोहावली आदि इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। इनके दोहों से सहज उद्गारों की अभिव्यक्ति स्पष्ट झलकती है। रहीम ने अपने काव्य में रामायणमहाभारत पुराण तथा गीता जैसे ग्रंथों के कथानकों को लिया है।

 1.     अमर बेलि बिनु मूल कीप्रतिपालत है ताहि।

रहिमन ऐसे प्रभुहिं तजिखोजत फिरिए काहि॥

(The creeper of Amarbeli doesn’t have any root, it is nourished by God. Why you are searching your roots when God is there to take care.)

अर्थ:जो ईश्वर बिना जड़ की अमर बेल का भी पालनपोषण करता हैऐसे ईश्वर को छोड़कर बाहर किसे खोजते फिर रहे हो। अरेऐसा ब्रह्म प्रभु ) तुम्हारे अंदर ही हैउसे वहीं खोजो। अमरबेलि में जड़ नहीं होतीबिलकुल निर्मूल होती है वहपरन्तु प्रभु उसे भी पालते-पोसते रहते हैं। ऐसे प्रतिपालक प्रभु को छोड़कर और किसे खोजा जाय?

 अर्थ और भाव : रहीम कहते हैं बिना जड़ की अमर बेल का पालन-पोषण करते हुए ईश्वर को त्यागकर मनुष्य संसार में व्यर्थ ही इधर-उधर शांति की खोज किस कारण से करता हैईश्वर बड़ा सदय है। इस धरती पर जड़-चेतनवह सभी का ख्याल रखता है जिसने भी जन्म लिया हैउसके पालन की व्यवस्था वह परमात्मा स्वत: ही कर देता है। निर्बल और असहाय व्यक्तियों की देखभाल ईश्वर करता है। यह मनुष्य व्यर्थ में शांति की खोज में भटकता हैजबकि परमात्मा तो उसके भीतर ही बैठा हुआ है। वह हर पल उसका ख्याल रखता हैअत: हमें सदैव उसे स्मरण करते रहना चाहिए।

2. अनुचित उचित रहीम लुधकरहि बड़ेन के जोर।

ज्यों ससि के संयोग तेपचवत आगि चकोर॥

अर्थ-महान् लोगों का सहयोग और समर्थन पाकर कभी-कभी छोटे लोग भी बड़े-बड़े काम कर जाते हैं। जैसे चंद्रमा के प्रेम में स्वयं को भूलकर चकोर अंगारे खाकर पचा लेता है। कोई भी बड़ा व्यक्ति तभी बड़ा बन पाता है जब वह बड़े लोगों की संगति में रहा हो। बड़े लोगों का मार्गदर्शन मिला हो। जिस प्रकार से एक छोटा सा चकोर पक्षी भी अंगारे पचाने का काम सीख लेता है।

3. अब रहिम मुसकिल परागाढ़े दोऊ काम।

   साँचे से तो जग नहींझूठे मिलैं न राम॥

(Rahim says that he is in a great difficulty. If he abides by truth he won’t keep the world in good humour. If he doesn’t abide by truth he will distance himself from Ram.)

अर्थ  रहीम कह रहे हैं की बड़ी मुश्किल में आ पड़े हैं  कि ये दोनों ही काम एक ही समय में कर पाना बड़ा कठिन हैं। सच्चाई से तो दुनिया दारी हासिल नही होती हैलोग रीझते नहीं हैंऔर झूठ से भगवान्  की प्राप्ति नहीं होती है। तो अब किसे छोड़ा जाए ए दुविधा है

अर्थ और भाव : कवि रहीम कहते हैं कि अब तो जीवन में ऐसी कठिनाई आ गई कि दोनों कार्य करने दुष्कर हो गए हैं। सत्य बोलने से संसार का काम नहीं चलता और मिथ्या (झूठ) भाषण से भगवान का मिलना संभव नहीं है। कभी-कभी आदमी के जीवन में ऐसे क्षण आ जाते हैंजब वह यह निर्णय नहीं कर पाता कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। उसकी स्थिति दोराहे पर खड़े उस व्यक्ति की तरह हो जाती हैजो सोच नहीं पाता कि किस रास्ते से आगे बढ़े।  एक मार्ग सत्य का है तो दूसरा मार्ग असत्य का। यदि सत्य के मार्ग को पकड़ता है तो उसे किसी तरह का तात्कालिक लाभ प्राप्त नहीं होता और झूठ के मार्ग को पकड़ता है तो ईश्वर नाराज होता है। ऐसे में मनुष्य को चाहिए कि वह तात्कालिक लाभ की चिंता न करे और सत्य के मार्ग पर ही चले क्योंकि यदि विधाता नाराज हो गया तो कहीं भी त्राण नहीं है। कहीं भी सुख नहीं है। जीवन भर वह झूठ उसे भीतर ही भीतर खाता रहेगा।

4. एकै साधे सब सधैसब साधे सब जाय।
        रहिमन मूलहिं सींचिबोफूलै फलै अघाय।।

(You should do only one thing with full devotion. If you try to do many things at a time you won’t accomplish anything. You should water roots of a tree properly and you get flowers and fruits. )

अर्थात मन को एक समय में एम विषय पर केंद्रित किया जाए तो उसमें सफलता मिलनी तय है। एक समय में अनेक विषयों में बुद्धि लगाने से किसी में भी सफलता अर्जित नहीं की जा सकती। कहा भी गया है कि जो आधे को छोड़ पूरे के चक्कर में भागता हैउसे पूरा तो नहीं मिलताआधे से भी हाथ धो बैठता रहीम कहते हैंएक को साधना ही पर्याप्त हैइससे सब सध हो जाते हैं। यदि सबको एक साथ साधने का प्रयास किया गया तो सबसे हाथ धोना पड़ेगा। पौधे को सींचने के लिए आवश्यक नहीं कि उसके तनेपत्तियों व फूलों की पंखुड़ियों को अलगसींचा जाए  . मूल को सींचना ही पर्याप्त है. इससे पौधा तृप्त होकर फलता फूलता है।                                              

 5.अंजन दियो तो किरकिरीसुरमा दियो न जाय।

     जिन आँखिन सों हरि लख्योरहिमन बलि-बलि जाय॥

 अर्थातजिन आखों में हरि के बसने वे आँखे पहले से सुंदर बन चुकी  हैं उन आँखों के लिए मैं अंजनसुरमा काजल जैसे प्रसाधन नहीं दे पा रहा हूँ क्योंकि भगवान के बसने से जो आँखें पहले से सुंदर बन चुकी हों उन्हें मैं फिर और अधिक सुंदर कैसे बना सकता हूँ। जो प्रसाधन के साधन है वे उपही सुंदरता बढ़ाते हैं। लेकिन जिन आँखों में भगवान पहले से बसे हो ऐसी आँखें तो बाहर और भीतर दोनों रूपों में सुंदर बन जाती हैं। अतआँखों की उपरी सुंदरता से अधिक भीतरी  सुंदरता अधिक महत्वपूर्ण है।

6.आब गई आदर गयानैनन गया सनेहि।
   
ये तीनों तब ही गयेजबहि कहा कछु देहि॥

अर्थात (Meaning in Hindi):  : ज्यों ही कोई किसी से कुछ मांगता है त्यों ही आबरूआदर और आंख से प्रेम चला जाता है। अपनी आन चली गईमान सम्मान भी गया और आंखों से प्रेम की भावना चली गयी। ये तीनों तब चले गये जब कहा कि कुछ दे दो अर्थात आप जब कभी किसी से कुछ मांगोगे। अर्थात् भिक्षा मांगने अपनी दृष्टि से स्वयं को गिराना है अतः भिक्षा मांगने जैसा त्याज्य कार्य कदापि न करो।

7. बिगरी बात बने नहींलाख करो किन कोय।
    रहिमन बिगरे दूध कोमथे न माखन होय॥

(There can’t be any reversal when an issue goes beyond it’s limit. Once a milk spoils, can you get butter by stirring. A million measures cannot reform a situation that has fallen apart, just like curdled milk cannot be churned to produce butter. Don’t let the situation go out of control. Exercise control over your words, because your words can make an enemy your friend, and a friend your enemy.)

अर्थ : जब बात बिगड़ जाती है तो किसी के लाख कोशिश करने पर भी बनती नहीं है। उसी तरह जैसे कि फटे हुए दूध को मथने से मक्खन नहीं निकलता। मनुष्य को सोच समझकर व्यवहार करना चाहिएक्योंकि किसी कारण वश यदि बात बिगड़ जाती है तो फिर उसे सुधार पाना  कठिन होता हैजैसे यदि एक बार दूध फट गया तो लाख कोशिश करने पर भी उसे मथ कर मक्खन नही निकाला जा सकेगा बिगडी बात को लाख उपाय करके भी संवारा नहीं जा सकता हैजैसे फटे दूध को लाख मथकर भी मक्खन नहीं निकलताइसलिये बात को बिगडने ही न दें। वाणी पर नियंत्रण रखेंक्योंकि वाणी शत्रु को भी मित्र और मित्र को भी शत्रु बना सकती है।

8. रूठे  सुजन मनाइएजो रूठे सौ बार।
    रहिमन’ फिर-फिर पोइएटूटे मुक्ताहार॥

One who is dear to you should be got back in the stride of love even if he goes away 100 times. Won’t you make a neck-lace of pearls again should it break? 

अर्थ : - अपना प्रिय एक बार तो क्यासौ बार भी रूठ जायतो भी उसे मना लेना चाहिए। जैसे हम मोतियों के हार के टूट जाने पर उसे फैंक नहीं  देते हैं बल्कि धागे में उन बिखरे  मोतियों को बार-बार पिरो कर फिर से हार बना लेते हैं। ठीक वैसे ही  यदि आपका प्रिय सौ बार भी आपसे नाराज हो जाएँ तो आपका कर्तव्य है की आप उसे सौ बार भी मना लें.  

9. जो रहीम उत्तम प्रकृतिका करी सकत कुसंग ।

    चन्दन विष व्यापत नहींलिपटे रहत भुजंग ।।

(Rahim says bad company can not spoil someone with excellent character. As, snakes are always there on sandalwood tree, but it never gets poisonous.)

भावार्थ कवि रहीम कहते हैं कि जो उत्तम स्वभाव और दृढ-चरित्र वाले व्यक्ति होते हैंबुरी संगत में रहने पर भी उनके चरित्र में विकार उत्पन्न नहीं
होता .जिस प्रकार चन्दन के वृक्ष पर चाहे जितने विषैले सर्प लिपटे रहेंपरन्तु उस वृक्ष पर सर्पों के विष का प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात चन्दन का वृक्ष अपनी सुगंध और शीतलता के गुण को छोड़कर जहरीला नहीं हो जाता . भाव यह है कि जिस प्रकार विषैले सर्प चन्दन के वृक्ष से लिपटे रहने पर भी उसकी सुगंध को विषैला नहीं बना सकतेउसी प्रकार दुर्जन और दुष्ट प्रवृत्तियों वाले व्यक्तिदृढ-चरित्र वाले व्यक्ति को दुर्जन या दुष्ट नहीं बना सकते

10. रहिमन ओछे नरन सोबैर भली ना प्रीत।
      काटे चाटे स्वान केदोउ भाँति विपरीत॥

 (It is not good to have affinity or enmity with a third rate person. If a dog has affinity for you it will lick you, if it becomes adverse it will bite you. Both the things are not good.)

 अर्थ :- रहीम कहते हैं  ओछे लोगो से न  प्रेम  व्यवहार अच्छा  न शत्रुता क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों  में हमें नुकसान ही होगा। उनका व्यवहार उस स्वान(कुत्ता) जैसा है जो खुश होकर चाटे तो भी खराब व नाराज होकर काटे तो भी अहितकर होता है। इसलिए जीवन में हमें बुरे लोगों की संगत करने से बचना चाहिए